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द फैमिली मैन रीव्यू

By करण संजय शाह
September 30, 2019 14:51 IST

द फैमिली मैन  वही जासूसी ड्रामा है, जिसका भारत को लंबे समय से इंतज़ार था, करण संजय शाह ने तारीफ़ में कहा।

The family man

मनोज बाजपाई, प्रियमणि, शारिब हाशमी, गुल पनाग और शरद केलकर जैसे तगड़े अभिनेताओं और राज निदिमोरू और कृष्णा डीके जैसे प्रतिभाशाली डायरेक्टर्स के साथ, द फैमिली मैन  से बहुत ज़्यादा उम्मीदें की जा रही हैं।

और यह आपको बिल्कुल निराश नहीं करती।

आप पहले एपिसोड से ही इसमें रम जाते हैं और बिना कोई ब्रेक लिये लगातार पूरे 10 एपिसोड देख सकते हैं।

यह एक बेहद सीधा-सपाट, दिलचस्प, ख़ूबसूरती से लिखा गया जासूसी ड्रामा है, जो आपको आपकी कुर्सी से बांध कर रखेगा।

घुमाव, उतार-चढ़ाव और मुश्किलें अंत तक कुतूहल को बनाये रखती हैं।

द फैमिली मैन  की कहानी मनोज बाजपाई के किरदार श्रीकांत तिवारी के इर्द-गिर्द घूमती है।

वह एक मध्यमवर्गीय आदमी है, जो गुप्त रूप से नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी (NIA) के थ्रेट ऐनलिसिस सर्वीलेंस सेल (TASC) के फील्ड एजेंट के रूप में काम करते हुए अपनी पारिवारिक ज़िंदग़ी में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

लगातार अपने बॉस, पत्नी और बच्चों की झिड़कियाँ सुनने के बाद भी वह अपने देश की सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध है।

श्रीकांत, उनके पार्टनर जेके तलपडे (शारिब हाशमी) और उनकी TASC टीम को देश पर मंडराते एक बड़े ख़तरे की जानकारी मिलती है।

मुंबई में एक घातक हमले की योजना बनाई जा रही है, लेकिन उनके हाथ अभी तक कोई बड़ा सुराग नहीं लगा है।

इस मामले में श्रीकांत अपना पूरा ध्यान लगा देता है, जिससे उसका पारिवारिक जीवन बिख़र जाता है।

उनकी पत्नी सुचित्रा तिवारी (प्रियदर्शनी) को पति-पत्नी के बीच दूरी बढ़ती दिखाई देती है और वह अपने सहकर्मी अरविंद (शरद केलकर) के करीब आने लगती है।

दूसरी ओर, एक चूहे-बिल्ली का खेल शुरू होता है, जो हमें मुंबई से श्रीनगर और फिर बलूचिस्तान ले जाता है और दिल्ली में जाकर ख़त्म होता है।

एशिया के आतंकवादी संगठनों के बीच की साठ-गाँठ सामने आती है।

क्या आतंकवादी भारत पर अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने में सफल हो जायेंगे?

क्या भारत और पाक़िस्तान के बीच फिर से जंग छिड़ जायेगी?

क्या द फैमिली मैन अपने परिवार और देश दोनों को बचाने में सफल होगा?

अधिक जानकारी के लिये एमेजॉन प्राइम वीडियो पर वेब सीरीज़ देखें।

द फैमिली मैन  वही जासूसी ड्रामा है, जिसका भारत को लंबे समय से इंतज़ार था!

डायरेक्टर राज और डीके आपको हर सेकंड कुतूहल में रखते हैं, जो कि 10 एपिसोड की सीरीज़ के लिये मुश्किल काम है।

वेब सीरीज़ को काफ़ी रीसर्च के बाद पेश किया गया है, और यह वास्तविक, दैनिक घटनाओं पर आधारित है।

भारत की गुप्तचर एजेंसियों की सहायता संबंधी और आर्थिक सीमाओं, युवाओं का आतंकवाद की ओर रुख़ करना, जम्मू-कश्मीर मुद्दे और भारत-पाक़िस्तान के रिश्तों को बख़ूबी दिखाया गया है।

आप श्रीकांत और उसकी टीम के साथ पहेली को हर पल सुलझाते रहते हैं।

इसके चौंकाने वाले ट्विस्ट आपको हैरत में डाल देंगे और क्लाइमैक्स आपके होश उड़ा देगा।

इसमें ग़रीबी, भ्रष्टाचार और भेदभाव जैसी जीवन की कठोर वास्तविकताओं को दिखाया गया है, जो आपका दिल दहला देती हैं।

आप इसके किरदारों की भावनाओं को महसूस कर सकते हैं।

ज़्यादा कठोर दृश्य, ख़ास तौर पर ऐक्शन सीक्वेंसेज़ और युद्ध के दृश्य, ख़ून और मार-काट विश्वसनीय और प्रभावशाली हैं।

सिनेमेटोग्राफी अच्छी तरह की गयी है और इसका श्रेय निगम बोमज़न और अज़ीम मूलन को जाता है। फ्रेम्स, लाइटिंग, बैकग्राउंड की चीज़ों और लोकेशन्स को अच्छी तरह चुना गया है।

बैकग्राउंड म्यूज़िक और हर सीन में इफ़ेक्ट्स शानदार हैं। केतन सोढा तारीफ़ के पात्र हैं।

डायलॉग्स के लिये सुमित अरोड़ा की तारीफ़ की जानी चाहिये। पंचलाइन्स, उपहास और चुटकुले शो की जान हैं।

मनोज बाजपाई अपने किरदार में जान डालते हैं। उनका अभिनय हमेशा की तरह लाजवाब है।

उन्होंने पूरी सीरीज़ को अपने कंधों पर उठा रखा है।

शारिब हाशमी ने उनका अच्छा साथ दिया है, और प्रियमणि ने भी।

ISIS के आदमी मूसा रहमान के रूप में नीरज माधव और साजिद के रूप में शादाब अली सरप्राइज़ बन कर सामने आये हैं और उन्होंने मुख्य आतंकियों का किरदार बख़ूबी निभाया है।

अरविंद के रूप में शरद केलकर, श्रीकांत के मार्गदर्शक के रूप में दलीप ताहिल, पाशांड के रूप में किशोर कुमार जी, श्रीनगर NIA ऑफ़िसर सलोनी भट्ट के रूप में ग़ुल पनाग अपने-अपने किरदारों में जँच रहे हैं।

एडिटिंग और डबिंग इससे बेहतर हो सकती थी।

कुछ सीक्वेंसेज़ में आपको विज़ुअल्स और ऑडियो में थोड़ा अंतर दिखाई देगा।

साथ ही, कुछ दृश्यों में VFX और CGI का काम बेहद घटिया है।

द फैमिली मैन  बेहद धीमी रफ़्तार से, घोंघे की चाल से शुरू होती है और अचानक तेज़ हो जाती है। शायद शुरुआत में इसे और तेज़ी दी जा सकती थी। कुछ सीक्वेंसेज़ को अनावश्यक रूप से खींचा गया है।

फिर भी, द फैमिली मैन  एक भारतीय जासूस से जुड़ी एक सामाजिक-राजनैतिक, ऐक्शन थ्रिलर के रूप में शानदार पेशकश है।

क्लाइमैक्स में आपको कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते।

क्या यह दूसरा सीज़न आने का संकेत है?

हमें इंतज़ार रहेगा।

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करण संजय शाह
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