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द ज़ोया फ़ैक्टर रीव्यू

September 21, 2019 19:15 IST

सिर्फ दलक़र फ़ैक्टर ही व्यंग्य बनने की नाकाम कोशिश करती इस बेमतलब, नीरस फिल्म की थोड़ी सी लाज रखता है।

द ज़ोया फ़ैक्टर  की शुरुआत होती है एक जानी-पहचानी आवाज़ से, जिसे हम दुनिया के दूसरे छोर से भी पहचान सकते हैं, जो भारत में क्रिकेट की तुलना डेंग्यू और मलेरिया से करती है।

चेतावनी दी जाती है कि यह एक ख़तरनाक बीमारी  है, जिससे हमारा देश पूरे साल प्रभावित रहता है।

उन्हें तो पता होगा ही।

क्योंकि यह आवाज़ है एक क्रिकेट टीम के मालिक की।

इस आवाज़ को रोमांस के बारे में भी काफ़ी कुछ पता है।

द ज़ोया फ़ैक्टर, जिसे इन दोनों चीज़ों के बारे में कुछ नहीं पता है, अगर उनकी थोड़ी सी सलाह ले लेती तो बेहतर होता।

भारत में क्रिकेट के पाग़लपन पर शाहरुख़ ख़ान की प्रस्तावना के बाद शुरू होती है अभिषेक शर्मा (तेरे बिन लादेन, द शौकीन्स, परमाणु: द स्टोरी ऑफ़ पोखरण) की अनुजा चौहान द्वारा 2008 में लिखी गयी किताब से प्रेरित एक कमज़ोर कहानी, जो दिखाती है कि क्या होता है जब एक बेमतलब, नीरस कहानी व्यंग्य बनने की नाकाम कोशिश करती है।

साउथ दिल्ली की लड़की ज़ोया सोलंकी (सोनम कपूर) एक एडवर्टाइज़िंग इक्ज़ेक्युटिव है, जो अपने सेना से रिटायर हुए पिता (संजय कपूर) और निकम्मे भाई (सिकंदर खेर) के साथ रहती है, जो उसे झाड़ू बुलाता है (किताब में फूले गालों की वजह से भाई उसे गालू बुलाता है)।

उसकी बॉस (कोयल पुरी) हमेशा ग़ुस्से में रहने वाली नकचढ़ी औरत है, जिसके बॉब बालों में स्टाइलिश स्ट्रीक्स दिखाई देते हैं।

अपने चिढ़ाने वाले भाई और नकचढ़ी बॉस की झिक-झिक से थोड़ी फ़ुर्सत मिलने पर ज़ोया भारतीय क्रिकेट टीम के साथ फैंसी, फ़ाइव-स्टार होटलों की नाश्ते की मेज़ पर दिखाई देती है, और कुछ लोग मानते हैं कि उसकी मौजूदग़ी लकी है, जिससे भारतीय टीम को जीत मिलती है।

एक ओर निखिल खोड़ा (दलक़र सलमान) टीम की प्रतिभा में विश्वास रखते हैं, तो दूसरी ओर बाकी की पूरी टीम इस अंधविश्वास को बढ़ावा देती है।

टीम इंडिया क्या अब जादू टोना का सहारा लेगी? एक समझदार व्यक्ति यही सोचता है, लेकिन क्रिकेट बोर्ड (मनु ऋषि के बख़ूबी निभाये गये किरदार के साथ भ्रष्टाचार में लिप्त) इस सोच का पूरा साथ देता है।

फिर रोमांस होता है, ईगो टकराते हैं, ग़लतफ़हमियाँ पनपती हैं और छुपे हुए फ़ायदे पाने वाले लोग (अंगद बेदी का विलेन का कमज़ोर किरदार) चालें चलते हैं और भारत लगातार एक के बाद एक मैच जीतता जाता है और ज़ोया क्रिकेट प्रेमियों के लिये एक भाग्यशाली ताबीज़ बन जाती है।

एक दशक पहले जब मैंने यह किताब पढ़ी थी, तब मुझे इसका रोमांस और चौहान का लेखन बेहद पसंद आया था।

मुझे ज़्यादा तो याद नहीं, बस इतना याद है कि मैंने ज़ोया के किरदार को श्वेता त्रिपाठी का और निखिल खोड़ा को महेंद्र सिंह धोनी का रूप दिया था।

हालांकि कहानी और ऐडिशनल स्क्रीनप्ले के लिये चौहान का आभार व्यक्त किया गया है, लेकिन पर्दे पर उतारी गयी इस कहानी में उस ख़ूबसूरत किताब की झलक बहुत ही कम दिखाई देती है।

यह बड़े ही दुःख की बात है, क्योंकि द ज़ोया फैक्टर  का तमाशा और टेन्शन बॉलीवुड स्क्रिप्ट के लिये बिल्कुल सही है।

मूवी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, ये गँवाये हुए मौके और भी साफ़ होते जाते हैं।

इस कहानी में बढ़ते अंधविश्वास या मर्दों की इस दुनिया में महिलाओं को देवी बनाये जाने के चलन के ख़िलाफ़ कुछ कहने की काफ़ी गुंजाइश थी।

लेकिन प्रायोजक ब्रांड्स की कमज़ोर ढंग से शूट की गयी ऐड रील्स और एक उबाऊ, बकवास रॉम-कॉम के बीच द ज़ोया फ़ैक्टर अपनी राह नहीं ढूंढ पाती।

काफ़ी चुटकुलों पर हँसी नहीं आती।

दाँत की केविटी के इलाज के लिये ऐनस्थीशिया के साथ डेंटिस्ट से दर्शक एक बार काम चला लें, लेकिन केविटी को लेकर सोनम कपूर की अनावश्यक प्रतिक्रिया हज़म नहीं होती।

हर सुबह टीम के सामने परोसे जाने वाले बेहद महँगे नाश्ते को देखने के बाद, केक की एक स्लाइस के लिये उनका पाग़लपन न तो हज़म होता है और न ही मज़ेदार लगता है।

ऐसा लगता है कि क्रिकेट जर्सी पहने संजय कपूर और सिकंदर खेर उस एक सीन का इंतज़ार कर रहे हों, जो कभी आया ही नहीं।

अनिल कपूर भी एक गेस्ट अपीयरंस में नज़र आते हैं, लेकिन इससे भी फिल्म का ह्यूमर बढ़ता नहीं है।

रचनात्मकता और कमेंट्री में नयी सोच की कमी के कारण द ज़ोया फ़ैक्टर  का सबसे कमज़ोर हिस्सा है क्रिकेट।

किरदार शिखर धवन, हरभजन सिंह और सचिन तेंडुलकर जैसे बनाये गये हैं, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ।

मूवी में खेले गये मैचेज़ से कहीं ज़्यादा मज़ेदार और सजीव तो स्टिक फ़िगर्स लगते हैं।

एक दृश्य में निखिल बोर्ड को एक मामूली मैच से ज़ोया को हटाने के लिये कहते हैं, क्योंकि उस मैच के रिज़ल्ट्स मायने नहीं रखते। अच्छा होता अगर डायरेक्टर शर्मा याद रखते कि इस बार के विश्व कप से भारत को बाहर का रास्ता किस टीम ने दिखाया था।

द ज़ोया फ़ैक्टर  के कुछ पल अच्छे भी हैं।

नवजोत सिंह सिद्धू के अंदाज़ वाली कमेंट्री मज़ेदार है। जैसे: ज़ोया के साथ पोहा खाने से कुछ नहीं हुआ  या जितना टाइम उसे रन बनाने में लग रहा है, उतने टाइम में आधार कार्ड बन जाता।

सोलंकी के घर पर हाउस पार्टी का एक दृश्य दिल को छूता है, जब निखिल 'दो पत्थर से एक चिड़िया मारने' वाले फोन कॉल्स से ज़ोया और उसके घर के बड़ों का दिल जीत लेता है।

लेकिन काश, इसे केमिस्ट्री का नाम दिया जा सकता।

सोनम कपूर ख़ूबसूरत और फैशनेबल लगती हैं। लेकिन इस किरदार में जँचती नहीं हैं।

ज़ोया सोलंकी एक संकोची, ख़ुद का मज़ाक उड़ाने वाली करोल बाग़ की लड़की है, जो मज़ाक का इस्तेमाल अपने बचाव के लिये करती है।

लेकिन इस महीने के वॉग में पोज़ करने के लिये तैयार सोनम जब 'मैं कभी मिस सैनिक फार्म्स की रनर-अप भी नहीं बनी' कह कर अपने ग्लैमर को नकारती हैं, तो उनकी बात झूठी लगना स्वाभाविक है।

इस रोल के लिये जूही चावला की कॉमिक टाइमिंग और करीना कपूर के गीत ढिल्लन के किरदार जैसी ज़िंदादिली की ज़रूरत थी।

जबकि सोनम अपने भीतर के असित सेन को बाहर लाती बुद्धू लगती हैं।

हालांकि कप्तान से ज़्यादा दलक़र क्लास मॉनीटर लगते हैं, लेकिन सिर्फ दलक़र फ़ैक्टर ही इस फीकी कहानी की थोड़ी सी लाज रख पाता है। उनका करिश्माई व्यक्तित्व और क्रिकेट, दोनों ही खिल कर पर्दे पर आये हैं।

अभी भी आपको क़िस्मत और ज़ोया में कोई दिलचस्पी है?

तो 2009 में आई किताब पढ़ना आपके लिये सबसे अच्छा विकल्प होगा।

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