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भारतीय छात्रों ने किस तरह से 6 दिन में दुनिया का सबसे पतला उपग्रह बना डाला

By दिव्या नायर
Last updated on: February 22, 2019 23:10 IST
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छह साल पहले, कुछ भारतीय छात्रों ने मिल कर एक सपने को साकार करने का कार्य आरंभ किया - भारत के लिए उपग्रह बनाए जाएं और अंतरिक्ष मिशन डिज़ाइन किए जाएं।

जनवरी 2019 में, इन्होंने मात्र छह दिनों में दुनिया का सबसे पतला, सबसे हल्का उपग्रह सफलतापूर्वक बनाकर और प्रक्षेपित करके इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा लिया।

फोटो: स्पेस किड्ज इंडिया के श्रीमति केसन जनवरी 2019 में लॉन्च से पहले कलामसैट वी 2 को थामे हुए। फोटोग्राफस: स्पेस किड्ज़ इन्डिया के सौजन्य से।

2017 में, अमेरिकी अंतरिक्ष अभिकरण्, नेशनल एयरोनॉटिक्स एन्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ने चेन्नई स्थित स्पेस किड्ज़ इन्डिया द्वारा बनाए गए 64 ग्राम वज़न वाले सब-ऑर्बिटल उपग्रह का प्रक्षेपण किया, जिससे भारत में अंतरिक्ष शि‍क्षा के क्षेत्र का सूत्रपात हुआ।

भारतीय छात्रों द्वारा बनाया गया 'गुलाब जामुन' नामक दुनिया का सबसे पतला उपग्रह बन पाता, कमी बस इतनी सी रह गई कि यह सब-ऑर्बिटल था और इसे ऑर्बिट यानी कक्षा में परिक्रमा किए जाने के लिए नहीं बनाया गया था।

दो साल बाद, जनवरी 2019 में, सात छात्रों के दल को स्‍पेस किड्ज़ इन्डिया की प्रवर्तक श्रीमती केसन द्वारा पैसा और मार्गदर्शन दिया गया – इन्‍हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा आमंत्रित किया गया और विश्‍व का सबसे पतला उपग्रह बनाने की चुनौती दी।

यह आह्लादित करने वाला अवसर था - अगर इन्‍होंने छह दिन में इसे बना दिया तो इसरो इसमें पैसा लगाकर इसे प्रक्षेपित करेगा।

चेन्‍नई से फोन पर मिशन की डायरेक्टर श्रीमती केसन ने दिव्‍या नायर/रीडिफ.कॉम से कहा कि, "मैं तो अवाक रह गई।"

उपग्रह को बनाकर प्रक्षेपित करने में कई करोड़ रुपए लगते हैं। अपने आप पैसा जुटा कर कार्य करने वाली इस टीम ने यदि पहले अपने बल पर यह कार्य आरंभ किया होता तो इसे कई साल लग गए होते।

इसरो की पेशकश - चुनौती के रूप में - एक भगवान द्वारा भेजी गई लग रही थी, श्रीमति केसन याद करते हुए कि यह सब कैसे शुरू हुआ।

"दिसंबर 2018 में, दूरदर्शन (राष्‍ट्रीय टेलीविज़न चैनल) पर हमारा इन्‍टरव्‍यू लिया गया, जहां हमने भारत के उपग्रह को प्रक्षेपित करने के अपने सपने के बारे में बताया। एक महीने के भीतर, मैं इसरो कार्यालय में बैठा थी, इस पर चर्चा कर रहा थी कि जो अब तक किसी ने नहीं बनाया उसे किस तरह से डिज़ाइन किया जाए। और मेरे पास यह कर दिखाने के लिए मात्र छह दिन थे।"

कलामसैट वी2 (इसे एपीजे अब्‍दुल कलाम के नाम पर रखा गया; कलाम ने इसरो में कार्य किया और मिसाइल मैन कहलाए उसके बाद भारत के सबसे लोकप्रिय राष्‍ट्रपतियों में से एक के तौर पर विभूषि‍त हुए), के रूप में जब 1200 ग्राम वज़न वाले 10 सेमी के एक घन के आकार वाले दुनिया के सबसे प‍तले, सबसे हल्‍के ऑर्बि‍टल उपग्रह ने आकार लिया तो यह इतिहास बन गया। इसे बनाने में 12 लाख रुपए लगे।

पहली बार छात्रों द्वारा बनाए गए इस कलामसैट वी2 नामक उपग्रह को 24 जनवरी को भारतीय मानक समय के अनुसार 23.37 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया।

"हमें याद नहीं है कि ये छह दिन किस तरह से बीते। न तो हमने खाना खाया, न हम सोए, न ही हमने आराम किया। जीवन का यह सबसे स्वर्णिम अवसर था। हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हमने यह कर दिखाया। भारत ऐसा करने वाला पहला देश बना और इतिहास रचा" श्रीमती केसन ने कहा।

फोटो : ( बाएं से दाएं ) श्रीहरिकोटा , आंध्र प्रदेश में अब्दुल काशिफ़ , विजय लक्ष्मी नारायण एस , रिफ़त शारुक , श्रीमती केसन , कुणाल वसंत , यज्ञ साई और तनिष्क़ द्विवेदी।

इस टीम में श्रीमती केसन के अलावा, सात छात्र थे जिनकी आयु 19 और 21 वर्ष के बीच थी, जो कि इस लक्ष्य पर पिछले छह साल से कार्य कर रहे थे।

रिफ़त शारुक, अग्रणी वैज्ञानिक (टीम के पहले और सबसे कम आयु के सदस्य), मोहम्मद अब्दुल काशिफ़, अग्रणी इंजीनियर, यज्ञ साई, अग्रणी तकनीशियन, विनय भारद्वाज, डिज़ाइन इंजीनियर, तनिष्क़ द्विवेदी, फ्लाइट इंजीनियर, टी गोबीनाथ, बायोलॉजिस्ट और विजय लक्ष्मी नारायण एस, अग्रणी उपग्रह वास्तुकार, जैसे अल्पायु के इन होनहार छात्रों ने यह गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल की।

दुर्भाग्यवश, विनय और गोबीनाथ प्रक्षेपण के समय श्रीहरिकोटा नहीं आ पाए।

इसरो के अधिकारियों की सहायता और सहयोग के अलावा, श्रीमती केसन के बिना इसे कर पाना असंभव था, जिन्हें टीम के सभी छात्र अपनी जन्मदायिनी माता कहते हैं।

उन्होंने छह साल पहले भारत के लिए यह सपना देखा और स्पेस किड्ज़ इन्डिया की स्थापना अपनी बचत के थोड़े-थोड़े पैसों से की। 

"जब मैं छोटी थी तो मेरा सदा सपना रहा करता था कि मैं उपग्रह और रॉकेट बनाकर आसमान में छोड़ूं। मैं हवाई जहाज़ उड़ाना चाहती थी लेकिन 5 फुट 3 इन्च का मेरा कद आड़े आ गया।"

"मेरी शादी भी बहुत कम आयु में हो गई और मैं अपने सपने साकार नहीं कर पाई।"

"मैं अपने परिवार को बिना बताए अपने आपको व्यस्त रखने के लिए मैं और ही तरह के कार्य करती रही जैसे कि फैशन कोरियाग्राफी और डॉक्यूमेन्टरी लिखने का काम।"

"शादी के 15 साल बाद, मैंने 2012 में स्पेस किड्ज़ इन्डिया की शुरुआत की। मैं प्रतिभाशाली बच्चों को कम उम्र में ही अवसर और ट्रेनिंग देना चाहती थी, ताकि कम उम्र में ही अपने इनोवेशंस को डिजाइन और विकसित कर सके,” श्रीमति केसन कहती हैं, जो शादी के बाद हैदराबाद से चेन्नई चली गईं।

"स्कूली बच्चों को मैं नासा और रूस ले जाती रही जिससे कि बच्चों को अंतरिक्ष टैक्नोलॉजी का अनुभव हो। यह खर्चीला था इसलिए इसमें उन्हीं ने नाम लिखवाया जो वाकई इच्छुक थे।"

"हम बच्चों में वैज्ञानिक प्रतियोगिता करवाते थे जिससे कि उदीयमान अंतरिक्ष वैज्ञानिक सामने आएं और वे अपने हुनर का कमाल दिखा सकें।"

उन्होंने बताया कि, "मैंने बच्चों के एक खास दल को चुना क्योंकि उनमें मैंने वैसी ही ललक और लगन देखी जैसी कि बचपन में मुझमें हुआ करती थी।"

पिछले छह साल में, इस टीम ने दो सब-ऑर्बिटल उपग्रहों (नासा द्वारा प्रक्षेपित एक इनमें शामिल है) और पांच अधिक ऊंचाई वाले ग़ुब्बारों पर बीकानेर, राजस्थान में कार्य किया।

"उपग्रहों पर कार्य करना हमारे लिए नई बात नहीं थी। लेकिन हमें अभी बहुत कुछ सीखना शेष था क्योंकि अब हम ऑर्बिटल प्रक्षेपण पर कार्य कर रहे थे।"

21 वर्षीय बी.टेक एयरोस्पेस इंजीनियर यज्ञ साई ने हमें बताया कि, "इसरो के वैज्ञानिकों ने हमें कमाल का सहयोग दिया जिसकी वजह से हम छह दिनों के भीतर अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित कर पाए।"

इस बार दुनिया का सबसे हल्का उपग्रह बनाने की चुनौती भी हमारे सामने थी।

"अपने पहले वाले मिशनों में हमने जांच के विकल्प तलाशे थे लेकिन इस बार हमने इसरो केन्द्र पर ही जांचें कीं क्योंकि हमारे उपग्रहों को प्रतिष्ठित पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल) से प्रक्षेपित किया जाना था। हमें यह सुनिश्चित करना था कि हमारा उपग्रह सुरक्षापूर्वक इससे जा सके।"

"हमें अपने उपग्रह के लिए अनुमोदन कम समय में ही मिल गया, हमें एकीकरण पर भी ध्यान देने की आवश्यकता थी।"

साई ने कहा कि, "हमारी टीम इसरो के वैज्ञानिकों के प्रति कृतज्ञ है कि उन्होंने हर कदम पर हमारी सहायता की।"

फोटो : हमारी टीम के पास समारोह मनाने का समय नहीं था। ये आजकल मून रोवर पर कार्य कर रहे हैं, यह एक हल्का रोबो है जिसे दिसंबर 2019 में चांद पर उतारा जाना है। इसे रूस के बायकोनुर कोस्मोड्रोम से प्रक्षेपित किया जाना है।

श्रीहरिकोटा के मिशन कन्ट्रोल से अपनी आंखों के सामने होते प्रक्षेपण को देखकर टीम उत्साह से भरी हुई थी।

"हमने कभी सोचा ही नहीं था कि हमें इतनी जल्दी ऐसा अवसर मिलेगा कि हम मिशन कन्ट्रोल से प्रक्षेपण देख पाएंगे। खूबसूरती तो यह रही कि प्रक्षेपण के तुरंत बाद ही इसरो के चेयरमैन डॉ. के शिवन ने हमें बुलाया। उनका बधाई देना और हमारे कार्य की सराहना के क्षण हमारे लिए नितांत गौरव की बात थे," साई ने बताया।

टीम कलामसैट वी2 से संकेतों की प्रतीक्षा में थी तभी श्रीमती केसन ने बताया, "चूंकि यह घनाकार है और यह पीएसएलवी के एक ओर चिपका हुआ है, इसलिए इसे तीन ओर से ही सौर ऊर्जा मिल पाती है। लेकिन यह दो महीने की परियोजना है इसलिए हम इससे एक चमत्कार की आशा थी।"

"उपग्रह का आकार अपने आप में कमाल है क्योंकि आपद काल के दौरान यह हमारा सहायक हो सकता है और यह उन अंधेरी जगहों पर पहुंच सकता है जहां अन्य उपग्रह नहीं पहुंच सकते। हम सबके लिए यह एक प्रयोग है, लेकिन भारत में यह पहली बार है और हमें इससे सीखने को बहुत कुछ मिलेगा।"

श्रीमती केसन चाहती हैं कि और कारपोरेट संगठन भारत में अंतरिक्ष मिशनों के सहयोग हेतु आगे आएं। उन्होंनें माता-पिता और छात्रों से कम आयु में ही प्रतिभा का पता लगाने की अपील की।

"हम सबमें प्रतिभा छुपी हुई है। यदि हम इसे जल्द ही पहचान लेते हैं तो हम कमाल कर सकते हैं।"

"अपने बच्चों को नई दिशाओं में विचार करने दीजिए उनके प्रति कोई पूर्वग्रह मत बरतिए। उनका ध्यान रखिए और उनमें निहित जादू को समझिए। पहचानिए कि आप इस जादू को आगे बढ़ाने में कैसे सहयोग कर सकते हैं और कैसे उनके सपने साकार करने में योगदान कर सकते हैं।"

"उन्हें उड़ने दें, हम उनके पंख बन जाएं।"

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