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जबरिया जोड़ी रीव्यू

August 14, 2019 12:58 IST

जबरिया जोड़ी ने भद्देपन को ख़ूबसूरती समझने की भूल की है, सुकन्या वर्मा ने महसूस किया।

Jabariya Jodi

पिछली बार जब सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिनीति चोपड़ा पर्दे पर साथ दिखे थे, तो कहानी उनके बचपन से शुरू हुई थी और एक शादी में बिन बुलाये मेहमान बनने के दृश्य पर ख़त्म हुई थी।

दोनों ने इस बार भी बिल्कुल ऐसा ही किया है।

जबरिया जोड़ी  मस्ती और ख़ूबसूरती के मामले में हँसी तो फँसी  के आस-पास भी नहीं है।

143 मिनट और 30 सेकंड तक कहानी को झेलने के बाद भी मुझे नहीं पता कि यह किस बारे में थी।

क्या यह बिहार में दूल्हों का अपहरण कर के ज़बर्दस्ती उनकी शादी कराने के चलन पर बनी एक पैरोडी है?

क्या यह लोगों को सहमति का महत्व समझाने या दहेज प्रथा की कुरीति को दूर करने की एक कोशिश है?

क्या यह भारतीय माता-पिता के लिये एक सीख है और समाज के अनुसार चलने के साइड इफ़ेक्ट्स दिखाती है?

क्या यह पुरुष-प्रधानता और उथले नारीवाद के बीच की लड़ाई है?

क्या यह घटिया एडिटिंग का एक उदाहरण है?

क्या एक टेस्ट है जिसमें परखा गया है कि सिद्धार्थ और परिनीति दर्शकों की आँख में चुभे बिना कितने भड़कीले और दिखावटी कपड़े पहन सकते हैं?

क्या यह एक भव्य कार्यक्रम है, जिसमें यह साबित करने की कोशिश की गयी है कि बॉलीवुड को ऐसी शादियों पर खर्च करना कितना पसंद है, जो शायद ही कभी होती हैं?

जबरिया जोड़ी  की टूटी-फूटी कहानी और भटका हुआ उत्साह इसे कई दिशाएँ देता है, लेकिन अंत में यह कहीं की नहीं रहती।

जिसके कारण आप खुद को क़ैद महसूस करते हैं और आपको एक ऐसी कहानी झेलनी पड़ जाती है, जिसमें न तो एक कुरीति पर व्यंग्य करने जितना दम है और न ही वर्तमान समस्या पर ध्यान देने की समझ।

प्रशांत सिंह द्वारा डायरेक्ट की गयी जबरिया जोड़ी  ने अपनी आधी से ज़्यादा एनर्जी हमें बार-बार यह याद दिलाने में खर्च की है, कि यह कहानी बिहार की है, जहाँ हादसे होना उतना ही आम है, जितना लिट्टी चोखा  या ई ना हो सके (डब की गयी मिशन इम्पॉसिबल) और मुर्ग़ डॉनल्ड (देसी मैक्डॉनल्ड्स) का दिखाई देना।

बिहारी लहजे और अंदाज़ पर पूरा ज़ोर देने के बावजूद इसका वातावरण रोहित शेट्टी के सेट जैसा लगता है, जिसमें इतने रंग हैं, जितने आपको रंगीन कैंडी की दुकान में भी न दिखें।

बबली यादव (परिनीति चोपड़ा) और अभय सिंह (सिद्धार्थ मल्होत्रा) बचपन के प्रेमी हैं। (सिद्धार्थ (बार बार देखो) और परिनीति (मेरी प्यारी बिंदी) का बचपन का प्यार कब ख़त्म होगा?)

'वो उससे प्यार करता है, लेकिन वो नहीं करती, वो उससे प्यार करती है, लेकिन वो नहीं करता,' का सिलसिला पूरी फिल्म में जारी रहता है, जिसे पाँच मिनट में सुलझाया जा सकता था, लेकिन जबरिया जोड़ी  बेमतलब के झगड़े पैदा करके हमारी तकलीफ़ बढ़ाती रहती है।

दहेज-प्रथा के जवाब में अभय का दूल्हे उठाने का व्यापार कभी भी उसकी मजबूरी नहीं दिखाता।

ये लड़के महिलाओं का कोई सम्मान नहीं करते, लेकिन फिर भी महलों में रहते हैं और दूल्हनों को अयोग्य दूल्हे देने को पुण्य के काम का नाम देते हैं।

जबरिया जोड़ी  के भटके हुए आदर्श हैरान कर देते हैं। और इसकी 'क्रांतिकारी' महिलाओं द्वारा लिया गया बदला भी उतना ही अजीब है।

जब क्लाइमैक्स में पिछली बातों पर सवाल उठता है, तो पछतावा बिल्कुल बनावटी, प्रभावहीन लगता है।

बबली और अभय मिलने, बिछड़ने, ठुकराये जाने, बदले, राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और पिता की झिड़कियों के साथ-साथ अपनी दुविधा और हमारी चिढ़ के दौर से ग़ुज़रते रहते हैं -- लेखन (संजीव के झा) पूरी तरह बिखरा हुआ है और घटिया एडिटिंग (रितेश सोनी) ने इसे और बिगाड़ दिया है, जिनके कारण ये उबाऊ सिलसिला और लंबा चलता है।

हालांकि इसके डायलॉग्स में दम है -- जैसे कुछ रिश्तों में डर और सम्मान के बीच के मामूली अंतर के बारे में कही गयी प्यारी सी बात -- लेकिन जबरिया जोड़ी का टूटा-बिखरा सेटअप किरदारों को दमदार बनने से रोक देता है।

सिंह के तगड़े सहायक अभिनेता तो चुने हैं -- जावेद जाफ़री, संजय मिश्रा, अपरशक्ति खुराना, शीबा चढ्ढा, चंदन रॉय सान्याल और शरद कपूर -- लेकिन उन्हें बांध कर रखा है और उनकी चमक बाहर नहीं आ पाई है। सिद्धार्थ और परिनीति की केमिस्ट्री अच्छी है लेकिन कई जगह उनके किरदार खोखले लगते हैं, जहाँ तड़क-भड़क की जगह भावनाओं की ज़्यादा ज़रूरत थी।

दबंग दिखने के लिये मिथुन चक्रबर्ती के अंदाज़ में डांस करते उत्साही सिद्धार्थ और बहन प्रियंका के लव स्टोरी 2050 के हेयर कलर जैसे लगने वाले अपने बालों के लाल हाइलाइट्स दिखाती अच्छे स्वभाव की परिनीति के बीच, जबरिया जोड़ी  की कहानी ने लगातार भद्देपन को ख़ूबसूरती समझने की भूल की है।

 

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सुकन्या वर्मा
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