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रीव्यू: अक्षय और ऐक्शन हैं केसरी की ताकत

Last updated on: March 22, 2019 17:49 IST

'केसरी की स्क्रिप्ट का काफी बड़ा हिस्सा सरदार, हवलदार इशर सिंह के रूप में अक्षय के निडर, सदाचारी व्यक्तित्व को सामने लाने पर ज़ोर देता है।'

'काबिले-तारीफ़ है कि एक मिशन पर डटे तेज़-तर्रार सरदार की भूमिका में अक्षय के इस किरदार ने संयम और सच्चाई की एक मिसाल पेश की है' सुकन्या वर्मा ने बताया।

10,000 अफ़ग़ानी आदिवासियों के ख़िलाफ़ 21 सिख सैनिकों की लड़ाई - यह आँकड़ा वाकई चौंकाने वाला है और सही मायनों में एक ख़ून-ख़राबे वाली ऐक्शन फिल्म की कहानी तैयार करता है।

केसरी  सिर्फ एक समुदाय को सम्मान ही नहीं देता, बल्कि एक अच्छी फिल्म की कसौटी पर भी खरा उतरता है, अगर आप थोड़ा सा सब्र रखें।  

यह सन्‌ 1897 की कहानी है और बॉलीवुड की ऐतिहासिक फिल्में घिसे-पिटे सबटेक्स्ट और उबाऊ भावनात्मक पहलुओं के लिये हक़ीक़त को लंबा खींचती ही हैं।

स्पिति घाटी के ख़ूबसूरत बर्फीले पहाड़ों और पथरीली वादियों के बीच शूट की गयी केसरी की कहानी 150 मिनट से ज़्यादा छोटी और ज़्यादा दिलचस्प हो सकती थी, अगर युद्ध की तैयारियों में चालबाज़ी से ज़्यादा रणनीति को दिखाया जाता।

तो भले ही इसमें कितनी भी समानता दिखाई गयी हो, आखिर है तो यह अक्षय कुमार की फिल्म।

अगर अभी भी बात आपकी समझ में नहीं आयी, तो ग़ौर फरमायें कि फिल्म में उन्होंने भगवा पगड़ी भी पहनी है।

 

अफ़ग़ानी लड़की को मौत की सज़ा से बचाने में अक्षय कुमार की बहादुरी से लेकर दुष्ट ब्रिटिश अफ़सर से अपमानित होने पर उनकी देशभक्ति को पहुंची ठेस और सारागढ़ी में 36 सिख रेजिमेंट का नेतृत्व संभालने में उनकी टीम भावना के साथ-साथ स्थानीय आदिवासियों के लिये मंदिर बनवाने में उनकी धर्म-निरपेक्षता तक, केसरी  की स्क्रिप्ट का काफी बड़ा हिस्सा सरदार, हवलदार इशर सिंह की भूमिका में अक्षय के निडर, सदाचारी व्यक्तित्व को सामने लाने पर ज़ोर देता है।

काबिले तरीफ़ है कि एक मिशन पर डटे तेज़-तर्रार सरदार की भूमिका में अक्षय के इस किरदार ने संयम और सच्चाई की एक मिसाल पेश की है।

अनुराग सिंह की यह फिल्म सारागढ़ी की लड़ाई का एक नाटकीय रूपांतर है, जिसमें ब्रिटिश सेना के सिख जवानों की एक टुकड़ी ने एक बहुत ही बड़ी दुश्मन सेना से लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था, और यह फिल्म सिख समुदाय, उनकी बहादुरी और धर्म-सिद्धांतों को सम्मान देती है।

सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि इशर सिंह अपने बावर्ची को सभी घायलों को पानी पिलाने का आदेश देते हैं, चाहे घायल अपना हो, या दुश्मन सेना का। यह युद्ध को एक आध्यात्मिक नज़रिये से देखने का उनका तरीका है, जिसमें उनकी सीख और सिद्धांतों की झलक साफ़ दिखती है।

जबकि दूसरी ओर उनकी दुश्मन सेना ख़ूंखार होने की सभी हदें पार कर चुकी है। अगर ब्रिटिश लोग अपने ग़ुलामों को नीचा दिखाने में खुशी महसूस करने वाले अकड़ू मालिक थे, तो अफ़ग़ान धर्म की आड़ में हिंसा फैलाने वाले वहशी दरिंदे थे।

सिंह की आर या पार की लड़ाई में कोई बीच का रास्ता नहीं है।

कहानी में कॉमेडी और रोमांस की जगह तब तक ही है, जब तक केसरी  की कहानी अपनी असली उड़ान नहीं भरती।

इशर सिंह की पत्नी के किरदार में परिनीति चोपड़ा उनके साथ अपने ख़्यालों में बातें करती रहती हैं और उनकी ज़्यादा बड़ी भूमिका नहीं है। लेकिन घर की याद में तरसते सारागढ़ी के उनके साथियों पर उतना ध्यान ज़रूर दिया गया है कि उनके मरने पर हमें बुरा महसूस हो।

जंग शुरू होते ही, केसरी  की कहानी एक नयी रफ़्तार पकड़ लेती है। दुश्मन सेना बहुत बड़ी होने के बावजूद, राइफ़लधारी जवान अपनी जगहों पर डट कर दुश्मनों से घिरे किले की रक्षा करते हैं।

उन्हें पता है कि इसका अंत क्या होगा।

आपको भी पता है कि इसका अंत क्या होगा।

लेकिन सच्ची बहादुरी के प्रदर्शन, जोश से भरे तनाव और तेज़ी से घटती घटनाओं ने मुझे मेरी सीट से बांधे रखा।

अंत में माहौल ख़ौफ़नाक हो जाता है।

किले के दरवाज़े पर मची मार-काट, ऊपर चढ़ने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले लाशों के ढेर, ख़ून से सनी दीवारों, एक के बाद एक सीने को छेदती तलवारों के बीच, इस कहानी का अंत केसरी  कम और लाल ज़्यादा है।

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सुकन्या वर्मा
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