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कभी लौट कर न आने वाला IAF का महानायक, जिसका बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता

Last updated on: March 15, 2019 20:01 IST

कारगिल युद्ध के दौरान स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा की मिग-21 को मार गिराये जाने पर उन्हें लाइन ऑफ़ कंट्रोल के उस पार इजेक्ट करना पड़ा, जिसके बाद उन्हें प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या कर दी गयी।

विंग कमांडर सी एच बाल रेड्डी (रिटायर्ड) ने उनके मृत शरीर को पहचाना और ताबूत में उनके घर लाये।

उन्होंने रिडिफ.कॉम  की अर्चना मसीह को इस महानायक के बारे में बताया, जिसके बलिदान को हमें भूलना नहीं चाहिये।

फोटो: मई 1999 में स्क्वॉड्रन लीड्रर अजय आहूजा के शव को सम्मान समारोह के लिये ले जाते हुए भारतीय वायु सेना के अधिकारी।

जहाँ एक ओर भारत विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की वापसी का जश्न मना रहे है, वहीं दूसरी ओर यह माहौल भारतीय वायु सेना के उस पायलट की याद ताज़ा कर देता है, जो कभी लौट कर नहीं आए।

स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा की मिग-21 को एक स्टिंगर मिसाइल ने मार गिराया,  जब वह 1999 के कारगिल युद्ध के शुरुआती दिनों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में इजेक्ट करने वाले फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट के नचिकेता का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे।

फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट नचिकेता को आठ दिन बंदी बनाये रखने के बाद वापस भेज दिया गया। वह हाल ही में IAF के ग्रुप कैप्टन के पद से रिटायर हुए।

स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा को प्रताड़ित करने के बाद उनकी हत्या कर दी गयी। तीन दिन बाद, पाकिस्तान ने एक बॉर्डर चेक पोस्ट पर उनका शव भारतीय सेना को सौंप दिया।

स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा की स्क्वॉड्रन के एक युवा अधिकारी बाल रेड्डी ने उनके मृत शरीर को पहचाना और उनके शव को घर वापस लाये।

IAF छोड़ने के नौ साल बाद अब इंडिगो एयरलाइन्स उड़ाने वाले पायलट को लगभग 20 साल बाद भी वो दिन अच्छी तरह याद है।

"जब तक मैंने उनका मृत शरीर नहीं देखा था, मुझे यक़ीन था कि आहूजा सर ज़िंदा होंगे और लौट कर ज़रूर आयेंगे," 14 साल की सेवा के बाद IAF छोड़ने वाले अधिकारी ने बताया।

"ताबूत देखने पर भी मुझे लगा कि वो ताबूत उनके शरीर के लिये काफी छोटा है - लेकिन ताबूत खुलने पर उन्हें देख कर मुझे बड़ा दुःख हुआ," विंग कमांडर रेड्डी (रिटायर्ड) ने हैदराबाद से फोन पर बताया।

वह स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा से मई 27, 1999 की सुबह उनके आखिरी स्ट्राइक मिशन की उड़ान से कुछ मिनट पहले ही मिले थे।

उन्हें याद है कि उन्होंने कुछ पैसों से भरा एक लिफ़ाफ़ा उन्हें सौंपा था, जो श्रीमती अल्का आहूजा ने अपने पति के लिये भेजा था।

श्रीमती आहूजा और उनका आठ साल का बेटा भटिंडा के एयर फोर्स स्टेशन पर थे, जहाँ स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा को ठहराया गया था।

कारगिल युद्ध के दौरान स्क्वॉड्रन कश्मीर आ गयी थी और फ़्लाइंग ऑफ़िसर रेड्डी को कमांडिंग ऑफ़िसर (मौजूदा एयर स्टाफ़ प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल बिरेंदर सिंह 'टोनी' धनोआ) के ओर से एक मिग-21 के साथ श्रीनगर आने के निर्देश मिले।

पिछले साल, एयर स्टाफ़ प्रमुख ने 'मिसिंग मैन' फॉर्मेशन बना कर स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा और कारगिल के अन्य शहीदों को सम्मानित किया। जहाज़ों की इस संरचना में जेट्स के बीच में एक खाली जगह रख कर खोये हुए सैनिक को याद किया जाता है।

फोटो: कारगिल विजय दिवस के अवसर पर अमर जवान ज्योति में इंडिया गेट पर आयोजित एक समारोह के दौरान तीनों सेनाओं द्वारा गार्ड ऑफ़ ऑनर।फोटोग्राफ: Vijay Verma/PTI Photo

पोस्ट मॉर्टेम रूम में, तत्कालीन फ़्लाइंग ऑफ़िसर रेड्डी ने देखा कि स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा का जी-सूट उतार दिया गया था और वो सिर्फ उनकी ऊपरी पोशाक में थे। उनके बैजेज़ तोड़ कर निकाल लिये गये थे।

लेकिन उनकी ऊपरी पोशाक की जेब में उनकी पत्नी का भेजा गया पैसों का लिफ़ाफ़ा अभी भी था। उनके शरीर पर दो गोलियों के घाव थे और शारीरिक उत्पीड़न के संकेत देखे जा सकते थे।

फ़्लाइंग ऑफ़िसर रेड्डी ने रु 1,300 में एक ताबूत की व्यवस्था की। defencelover.in में प्रकाशित एक बयान में उन्होंने बताया है कि आर्मी बेस हॉस्पिटल में ही उन्हें अंदाज़ा हुआ कि कारगिल युद्ध कितने बड़े पैमाने पर हुआ था।

युद्ध अभी शुरू ही हुआ था, लॉजिस्टिक्स की अभी भी पूरी व्यवस्था नहीं थी और वर्कशॉप में ताबूत बहुत ही धीरे-धीरे बन रहे थे।

जुलाई 26, 1999 में युद्ध के अंत तक, 527 भारतीय सैनिक अपने प्राणों की आहूति दे चुके थे, और राष्ट्रीय झंडे में लिपटे उनके शव उनके घर जा चुके थे।

'ताबूत सेना की आंतरिक मांग न होने के कारण मैनेजर ने मुझे पैसे भरने के लिये कहा। मेरे पास मेरा बटुआ नहीं था और ऐसे में आहूजा सर के कैश ने मेरी मदद की,' विंग कमांडर रेड्डी लिखते हैं।

युवा फाइटर पायलट होने के नाते, विंग कमांडर रेड्डी दुश्मनों के ख़िलाफ़ मिशन पर उड़ने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्हें अगले कुछ दिनों तक क्रिया-कर्म और मृत्यु के बाद की काग़ज़ी कारवाई का काम सौंप दिया गया।

और उन्होंने खुद को पूरी तरह इस मिशन के लिये समर्पित कर दिया।

"इजेक्शन पायलट के लिये ज़िंदग़ी बदल देने वाला एक पल होता है," विंग कमांडर रेड्डी बताते हैं। "फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट नचिकेता दुबारा कभी फाइटर कॉकपिट में नहीं जा पाये और आहूजा सर वापस ही नहीं लौटे।"

स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा की पत्नी को कारगिल शहीदों के करीबी रिश्तेदारों की नीति के अनुसार एक पेट्रोल पंप दिया गया। वह दिल्ली में बस गयीं।

उनके बेटे अंकुर ने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग से ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की और अब गुड़गाँव में काम कर रहा है।

जब रिडिफ.कॉम  ने श्रीमती आहूजा से संपर्क किया, तो उन्होंने विनम्रता से जवाब दिया कि उनके पति के बारे में बात करना उनके लिये मुश्किल होगा।

उनके पति के बलिदान पर प्रस्तुत एक पुरानी टेलीविज़न रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि उन्हें आखिरी बार उनके पति का चेहरा न देखने की सलाह दी गयी थी।

भर्राई हुई आवाज़ में उन्होंने कहा कि यह एक अच्छा फैसला था, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन वह अपने पति का मुस्कुराता चेहरा दुबारा ज़रूर देखेंगी।

शहीदों को सलामी देते समय, हमें उनके करीबी लोगों की हिम्मत को भी सलाम करना चाहिये।

स्क्वॉड्रन लीडर आहूजा को उनकी मृत्यु के बाद वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

पिछले साल जब एयर चीफ़ मार्शल धनोआ ने 'मिसिंग मैन' फॉर्मेशन का नेतृत्व किया था, तब श्रीमती आहूजा भी वहाँ मौजूद थीं और उन्हें इस फॉर्मेशन का एक प्लाक उपहार के रूप में दिया गया।

हाल में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल फिर गरमाने पर, अब एक कमर्शियल एयरलाइन उड़ाने वाले विंग कमांडर बाल रेड्डी ने कहा कि भारत ने लाइन ऑफ़ कंट्रोल को पार करके अच्छा किया, जो कि कारगिल युद्ध में नहीं किया गया था।

"कारगिल के समय पायलट्स के हाथ बंधे हुए थे, जिन्हें बालाकोट के समय खोल दिया गया," उन्होंने कहा, और साथ ही मीडिया को सलाह भी दी।

उन्हें लगता है कि मीडिया कश्मीर और उत्तर-पूर्व में शहीद होने वाले सुरक्षाकर्मियों को ज़्यादा श्रेय नहीं देते।

"रिपोर्ट्स में उनके नाम तक नहीं होते," उन्होंने कहा। "शहीद हुए हर सुरक्षाकर्मी की जानकारी देश को देना मीडिया का कर्तव्य है - चाहे कोई अफ़सर हो या जवान - और चाहे वो थलसेना में हो, नौसेना में हो या वायुसेना में।"

अर्चना मसीह
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