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एक असाधारण भारतीय का शोकपूर्ण निधन

By ज्योति पुनवानी
Last updated on: June 12, 2019 16:12 IST

ज्योति पुनवानी ने कई बच्चों की जिन्दगियाँ बदलने वाले समाजसेवक सैयद फ़िरोज़ अशरफ़ को श्रद्धांजलि दी।

 Syed Feroze Ashraf with his students. The do-gooder ran his Uncle's Classes for free and helped many poor Muslims graduate. All photographs: Afsar Dayatar/Rediff.com

फोटो: सैयद फ़िरोज़ अशरफ़ अपने विद्यार्थियों के साथ। इन्होंने मुफ़्त में अपनी अंकल्स क्लासेज़ चला कर कई ग़रीब मुसलमानों को ग्रैजुएट बनाने में मदद की।

सभी फोटोग्राफ: अफ़सार दयातर/रिडिफ़.कॉम

अगर 'पीड़ित' मुसलमानों की बात की जाये, तो सैयद फ़िरोज़ अशरफ़ पूरी तरह इस श्रेणी में आते हैं।

लेकिन 1992-1993 के दंगों से अपने जीवन में आये बदलाव के बावजूद, क्रांति में पूरा विश्वास रखने वाले इस पत्रकार और पूर्व ट्रेड यूनियनिस्ट ने अपनी तकलीफ़ को भूल कर अपना पूरा जीवन लोगों की जिन्दगियाँ बदलने के लिये समर्पित कर दिया।

1992-1993 के दंगों के बाद, हिंसा के कारण सदमे से ग्रस्त अपने नन्हे बेटे के लिये अशरफ़ ने मलाड की शांत गली से निकल कर जोगेश्वरी के मुख्य मस्जिद के पास भीड़-भाड़ वाली बस्ती में जाकर रहने का फैसला किया।

इस उर्दू-हिंदी पत्रकार के लिये यह बदलाव सिर्फ जगह के बदलाव से कहीं ज़्यादा था।

उनके इलाके के व्यापारियों को अखबारों की कोई ज़रूरत नहीं थी; और वहाँ पर सिर्फ एक ही समुदाय के त्यौहार मनाये जाते थे।

उन्होंने वहां कभी झंडा फहराया ही नहीं था -- अशरफ़ ने पहली बार इसका आयोजन किया।

हज़ारीबाग़ में सभी हिंदू त्यौहार मनाते हुए पले-बढ़े, बेझिझक सरस्वती वंदना  गाने वाले अशरफ़ को ऐसे माहौल में ढलने में समय लगा।

अगर ज़िम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर अचानक न आ जाता, तो शायद उन्होंने पड़ोस के ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाने का काम कभी शुरू नहीं किया होता।

उन्होंने वॉचमैन की बेटी से शुरुआत की और जल्द ही उनका छोटा सा घर जोगेश्वरी, उत्तर पश्चिम मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चों से, और ख़ास तौर पर छोटी बच्चियों से भरा रहने लगा।

जल्द ही अशरफ़ को महसूस हुआ, कि अगर उन्हें इन बच्चों की स्कूल की पढ़ाई पूरी करानी है, तो उन्हें इनके माता-पिता से मिलना होगा।

क्योंकि अगर एक साल भी ये बच्चे फेल हो गये, तो उनके माता-पिता उनका स्कूल छुड़ा देंगे।

Mr Ashraf with his students. A former Indian Oil employee, he wrote columns for the Navbharat Times for many years.

फोटो: श्री अशरफ़ अपने विद्यार्थियों के साथ। इंडियन ऑइल के पूर्व कर्मचारी, कई वर्षों से नवभारत टाइम्स के लिये स्तंभ लिखते आ रहे हैं।

किसी तरह, जोगेश्वरी पूर्व की संकड़ी, गंदगी से भरी गलियों के चक्कर काट-काट कर अशरफ़ ने इन बच्चों के अशिक्षित, रोज़ की मजदूरी पर जीने वाले पिताओं को समझाया कि स्कूल में पास होने के लिये उनकी बच्चियों को घर के काम से दो घंटों की छुट्टी, कुछ खाने -- वड़ा पाव  या कुछ भी, दो घंटों के लिये टीवी बंद करने और उनके भरे-भरे घरों में हमेशा खुले रहने वाले दरवाज़े से दूर एक उजाले वाले कोने की ज़रूरत पड़ेगी।

लेकिन माता-पिता को समझाने के बाद भी आधी लड़ाई अभी बाक़ी थी।

आधी लड़ाई थी स्कूल के प्रिंसिपल्स को यह समझाने की, कि वे सिर्फ SSC में 100% नतीजे दिखाने के लिये 9वीं कक्षा में पढ़ाई में कमज़ोर विद्यार्थियों को फेल करने की निर्दयी गतिविधि को बंद करें।

निश्चित रूप से, 9वीं में फेल होने वाली छात्रा के माता-पिता यह सोच लेते थे कि लड़की के लिये 9वीं तक की पढ़ाई काफ़ी है।

और अंत में, अशरफ़ को उर्दू मीडियम स्कूलों की इस पहली पीढ़ी के लिये पाठ्यक्रम को आसान बनाना पड़ा।  

उन्हें लगा कि अपनी आम ज़िंदग़ी से बिल्कुल अलग इन विषयों में महारथ हासिल करने का एकमात्र तरीका है इन्हें रट लेना।

अंग्रेज़ी में उनकी मदद करने के लिये, अशरफ़ पूरे अध्याय का सारांश छोटे-छोटे वाक्यों में बनाते थे, जो उनके विद्यार्थी आसानी से याद कर सकें।

लेकिन इतनी मेहनत भी शायद रंग नहीं लाती अगर उनकी  क्लासेज़ में खाने (ज़्यादातर लड़कियाँ भूखे पेट आती थीं), बीच-बीच में घूमने जाने की व्यवस्था, और अशरफ़ की पत्नी आरिफ़ा का साथ न होता।

BMC की कर्मचारी आरिफ़ा ने बच्चियों को अपनी ज़िंदग़ी को महत्व देना सिखाया।

1997 में 'अंकल' के पहले बैच ने SSC पास की। शनिवार, जून 8 को इस बैच के विद्यार्थी आरिफ़ा से मिलने उनके घर आये और उन्हें कॉलेज और ग्रैजुएशन की राह दिखाने वाले इंसान को याद करके फूट-फूट कर रोये।

विद्यार्थियों के अधिकारों के लिये अशरफ़ की लड़ाई कॉलेजों तक भी पहुंच गयी।

उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल्स से निवेदन किया कि वे आवेदकों के कम अंकों को अनदेखा करें और उनकी ज़िंदग़ी बदलने के लिये उन्हें कॉलेज में दाखिला दें।

उन्होंने इस नियम की ओर सबका ध्यान खींचा, कि 12वीं की बोर्ड परीक्षा उर्दू में लिखी जा सकती है।

अशरफ़ के पढ़ाये 500 से भी ज़्यादा विद्यार्थी आज वकील, शिक्षक, एडवर्टाइज़िंग एजेंसी के इक्ज़ेक्युटिव, कॉफ़ी शॉप असिस्टंट जैसे पदों पर काम कर रहे हैं; इनमें से कुछ कविताऍं भी लिखते हैं।   

अशरफ़ का सपना था अपने कम से कम एक विद्यार्थी को अंग्रेज़ी साहित्य में ग्रैजुएशन करते देखना। अविश्वसनीय रूप से, उनका यह सपना भी पूरा हुआ।

उनके पहले बैच की निलोफ़र ने संवाददाता को बताया कि अपनी आकस्मिक मौत से ठीक दो दिन पहले 'अंकल' ने उससे वादा लिया था कि वह अपनी वकालत का अंतिम सत्र पूरा करेगी।

"अब मैं उनके लिये इसे ज़रूर पूरा करूंगी," फीस भरने की चिंता के बावजूद उसने कहा।

Syed Feroze Ashraf changed the lives of so many.

फोटो: कई लोगों की जिन्दगियां बदलने वाले सैयद फ़िरोज़ अशरफ़।

अशरफ़ को पैसे मांगना बिल्कुल पसंद नहीं था; उनके काम के बारे में पढ़ने वाले कुछ लोगों से कभी-कभी मिलने वाले दान के अलावा, वह अपनी क्लास चलाने के लिये अपनी ही तंग ज़ेब और अपने दोस्तों का सहारा लेते थे।

इसलिये उनके दिल में अपने समुदाय के 'नेताओं' और 'बुद्धिजीवियों' के लिये नफ़रत के सिवा कुछ नहीं था।

"सब मुझसे कहते हैं: तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो। क्या वो लोग मेरी मदद नहीं कर सकते? समाज के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इन नेताओं और बुद्धिजीवियों ने क्या पिछड़ी बस्तियों में रहने वाले अपने समुदाय के बच्चों के लिये एक मुफ़्त रीडिंग रूम (पढ़ने का कमरा) तक बनवाया है?" रिडिफ.कॉम को दिये 2015 के साक्षात्कार में उन्होंने कहा था।

"क्या ये उर्दू के विद्वान कभी इन इलाकों में आये हैं? उनका फ़र्ज़ है इन बस्तियों में जाना। अगर वो नहीं जायेंगे, तो मुल्ला जायेंगे। यही बस्तियाँ हैं, जिन्होंने उर्दू को ज़िंदा रखा है,’’ उन्होंने ग़ुस्से के साथ कहा।

"और अगर कभी ये लोग वहाँ गये भी," उन्होंने आगे कहा, "तो वे इन इलाकों की बुराई ही करते हैं। उन्हें ये बात दिखाई नहीं देती, कि इन गंदग़ी से भरी बस्तियों में बच्चियाँ अपनी ज़िंदग़ी बनाने की कोशिश कर रही हैं।"

क्लासेज़ चलाने के 20 वर्ष के दौर में, अशरफ़ ने देखा कि इन बस्तियों की ग़रीबी कभी कम नहीं हुई।

अगर कोई चीज़ बदली थी, तो माता-पिता की सोच।

अब उन्हें माता-पिता को उनके बच्चों को पढ़ाने के लिये मनाना नहीं पड़ता था।

बेटियाँ अब बोलने लगी थीं, और माता-पिता सुनने लगे थे।

अपने इस मिशन के कारण फ़िरोज़ अशरफ़ को धर्म-निरपेक्षता जैसे विषयों पर विवाद के लिये कभी समय नहीं मिला।

उनके दो ही शौक थे -- पत्रकारिता और ग़रीब बच्चों को पढ़ाना।

फ़िरोज़ अशरफ़ ने पत्रकारिता के कई पुरस्कार जीते। नवंबर 2017 में, महाराष्ट्र राज्य ऊर्दू साहित्य अकेडमी ने उन्हें 'उर्दू की सेवा' के लिये सम्मानित किया।

और इस सम्मान का उनसे बड़ा हक़दार कोई हो ही नहीं सकता।

हाल में, एक उर्दू स्कूल ने 9वीं कक्षा के कुछ ऐसे विद्यार्थियों के लिये अशरफ़ की मदद मांगी, जो वाक्यों को एक-दूसरे से जोड़ नहीं पाते थे। अशरफ़ ने अपने पुराने विद्यार्थियों से पूछा कि क्या वो इस काम को कर सकते हैं।

उन्हें दिये गये तीन महीने ख़त्म होने पर, उन 9वीं कक्षा के विद्यार्थियों के माता-पिता ने बताया कि पढ़ाई से दूर भागने वाले उनके बच्चे अब ख़ुद ही पढ़ने लग गये हैं।  

और उन्हें दी गयी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि के रूप में उनके कुछ पुराने विद्यार्थियों ने ग़रीब उर्दू माध्यम बच्चों के लिये अपने-अपने इलाकों में 'अंकल्स क्लासेज़' की शाखाएँ खोल दीं।

ज़्यादा समय मिलने पर, फ़िरोज़ ने अपना एक नया सफ़र शुरू किया: ऐसे मुस्लिम नेताओं की तलाश का सफ़र, जिन्होंने आज़ादी से पहले देश के लिये योगदान दिया था।

"मुसलमानों को बुरा लगता है कि आज़ादी के समय से ही उनके नेताओं को अनदेखा किया गया है," उन्होंने एक बार मुझसे कहा था।

"जैसे मुसलमानों ने कुछ किया ही न हो, जैसे उनका योगदान सिर्फ पाकिस्तान को बनाने के लिये था।"

उन्होंने 2009 में ऐसे नेताओं पर एक साप्ताहिक स्तंभ लिखना शुरू किया; जल्द ही इसपर एक किताब प्रकाशित की जायेगी।

अपने समुदाय के लिये अशरफ़ की खोज 1996 के आस-पास शुरू हुई। इससे पहले उन्होंने अपना समय सुधारवादी बुद्धिजीवियों, वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच बिताया -- उन्हें लगता है कि ये वर्ष वो पूरी एक पीढ़ी को पढ़ाने में लगा सकते थे।

लेकिन 78 वर्षों के अपने जीवनकाल के अंतिम पच्चीस सालों में अशरफ़ ने अपने समुदाय से दूर बिताये वर्षों की भरपाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

शुक्रवार की रात को अगर एक लापरवाह ऑटो रिक्शा चालक ने उन्हें टक्कर नहीं मारी होती, तो उनके समुदाय के साथ-साथ हम सभी उनकी प्रतिबद्धता का और लाभ ले पाते।

ज्योति पुनवानी
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