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आइएएस अधिकारी: मैं गोडसेवादी कैसे हो सकती हूं?

Last updated on: June 15, 2019 17:53 IST

'बड़ी ही हास्यास्पद बात है कि आज मुझे गांधी और अपने देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित करना पड़ रहा है।'

Nidhi Choudhari 

फोटो: निधि चौधरी। फोटोग्राफ: Nidhi Choudhari/Twitter के सौजन्य से

31 मई को भारत में ट्विटर पर 17 मई को पोस्ट किये गये एक ट्वीट को लेकर सैलाब उमड़ पड़ा, जिसके अंत में लिखा था '30.1.1948 के लिये धन्यवाद, नाथूराम गोडसे'।

इस समय इस ट्वीट को लिखने वाली 2012-बैच की IAS अधिकारी निधि चौधरी गंगटोक में अपने परिवार के साथ छुट्टियाँ मना रही थीं।

एक सच्ची गांधीवादी और प्रभावशाली महिला निधि चौधरी ने इंटरनेट से संपर्क होते ही इस मुद्दे पर सफ़ाई दी।

तब तक महाराष्ट्र, जहाँ वो मुंबई की संयुक्त महानगरपालिका आयुक्त के पद पर नियुक्त हैं, के राजनेताओं ने राज्य सरकार की ओर से उन्हें कारण बताओ सूचना तो भिजवाई ही, साथ ही उससे पहले उनका तबादला जल एवं स्वच्छता विभाग में कर दिया गया।

"ये लोग (राजनेता) सोच भी कैसे सकते हैं कि मैं एक गोडसेवादी हो सकती हूं। आप मुझे गांधीवादी होने की सज़ा दे रहे हैं," जयपुर युनिवर्सिटी की स्वर्ण पदक विजेता चौधरी ने विडंबना पर सवाल उठाते हुए कहा।

महात्मा और सरदार वल्लभभाई पटेल और भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से प्रभावित चौधरी अपने तबादले को अपनी प्रगति का हिस्सा मानती हैं।

जब 10 जून को उन्होंने पदभार संभाला, तो अपने विवादित ट्वीट, उस पर मचे राजनैतिक कोलाहल और अपने तबादले तथा कारण बताओ सूचना पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी निष्ठा भारतीय संविधान की ओर है... किसी एक राजनैतिक पार्टी की ओर नहीं; हम भारत के संविधान और भारत देश के प्रति वफ़ादार हैं।"

"देश को आज के दौर में गांधीजी की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है। आज के दौर में गांधीजी को फिर से जन्म लेना चाहिये," 21वीं सदी में महात्मा गांधी के महत्व के बारे में पूछे जाने पर चौधरी ने रिडिफ.कॉम के लिये प्रसन्ना डी ज़ोरे को दिये गये एक साक्षात्कार में कहा।

आपने महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह से जुड़े सिद्धांतों को पढ़ना/समझना कब शुरू किया?

बचपन में मेरे पिता हमें भारत की आज़ादी की लड़ाई, स्वतंत्रता सेनानियों के सिद्धांतों और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के बारे में बताते थे।

अगर आपको दूरदर्शन वाले दिन याद हों, तो आपको याद होगा कि हर साल 2 अक्टूबर को गांधी  फिल्म दिखाई जाती थी और मैं हर साल उस फिल्म को ज़रूर देखती थी।

मेरे पिता ने हम बच्चों में भारत की आज़ादी की लड़ाई के मूल्य भरने की पूरी कोशिश की।

वो हमें सरदार पटेल, भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन पर आधारित फिल्में दिखाया करते थे।

उन्होंने हममें गीता और रामायण के सिद्धांत भी भरे हैं।  

वो हमें अच्छी किताबें पढ़ने के लिये देते थे।

और मेरे स्कूल के दिनों में भी जब भी कोई वक्तृत्व प्रतियोगिता या निबंध लेखन प्रतियोगिता होती थी, तो उसका विषय महात्मा ही होते थे।

गांधीजी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी हमारी परवरिश का एक हिस्सा थे।

और आपने महात्मा गांधी के सिद्धांतों को वास्तव में कब समझा?

मुझे लगता है कि ऐसा 11वीं और 12वीं तथा ख़ास तौर पर ग्रैजुएशन की पढ़ाई के दौरान हुआ।

मैं इतिहास और साहित्य की छात्रा हूं।

जब मैं अपने ग्रैजुएशन के दूसरे वर्ष में थी, तब संसद पर हमला हुआ था (दिसंबर 13, 2001); जिसके पहले 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ था।

सभी लोग पाकिस्तान से युद्ध की मांग कर रहे थे, लेकिन मेरा हमेशा से ही यही मानना था कि युद्ध इन दोनों देशों के लिये सही समाधान नहीं है।

मैं कारगिल युद्ध और कश्मीर की समस्या से जुड़े कई वाद-विवाद देखा करती थी।

उन दिनों, वाद-विवाद में हिस्सा लेने में मेरी काफी रुचि थी और तभी मैंने गांधी के साहित्य को बारीकी से पढ़ना शुरू किया, और तभी मैंने यह जाना कि गांधीजी क्यों शांति और अहिंसा को देश की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान मानते थे।

गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर मैं स्कूल और कॉलेज के हर वाद-विवाद में शांति को युद्ध से बेहतर समाधान बताती थी।

गांधीजी का जीवन आपकी निजी ज़िंदग़ी की समस्याऍं हल करने में किस प्रकार आपकी मदद करता है?

पहली बात, मैं मेरे आलोचकों से नफ़रत नहीं करती; मैं हमेशा उनके नज़रिये को समझने की कोशिश करती हूं, और गांधी की तरह ही मेरे भीतर किसी के लिये नफ़रत नहीं है।

मैं अपने काम से सिस्टम के भीतर क्रांति लाने की काबिलियत रखती हूं और समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती हूं।

मुझे लगता है कि स्थिति को बदलने का सबसे अच्छा तरीका है योगदान देते रहना, न कि समस्याओं से दूर भागना।

मैं परिवर्तन के लिये विनाश की नहीं, निर्माण की नीति में विश्वास रखती हूं।

मुझे लगता है कि क्रांति समस्याओं को दूर करने के लिये होनी चाहिये, नयी समस्याएँ पैदा करने के लिये नहीं।

यही गांधीजी का तरीका था।

अब (मई 17 के उनके ट्वीट और उनके तबादले के बाद), लोगों का कहना है कि मुझे अपनी लड़ाई जारी रखनी चाहिये; मुझे बिना किसी गलती के निशाना बनाया गया है।

लेकिन मैंने ख़ुद से कहा: क्या मुझे इस बात (जल एवं स्वच्छता विभाग में उनका तबादला) को चर्चा का विषय बने रहने देना चाहिये या मुझे समाज कल्याण के लिये योगदान देने पर ध्यान देना चाहिये (अपने नये काम में)

गांधीजी ने आज़ादी की लड़ाई में इसी बात पर विश्वास रखा था।

मैं याद दिलाना चाहूंगी कि जब असहयोग आंदोलन अपनी सफलता के शिखर पर पहुंच चुका था, तब चौरी चौरा में पुलिस वालों की नृशंस हत्या (भीड़ ने युनाइटेड प्रोविंस के चौरी चौरा पुलिस थाने में आग लगा दी थी, जिसमें 21 पुलिसकर्मी मारे गये थे) के बाद गांधीजी ने अपना आंदोलन वापस ले लिया था।

उस समय कई लोगों को लगा कि गांधीजी ने देश के साथ अन्याय किया है (अंग्रेज़ों के उपनिवेशी शासन के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करने के कार्यक्रम को बंद करके)

गांधीजी के सिद्धांतों को पढ़ने पर ही हम समझ पाते हैं कि उस समय हुई हिंसा से उन्हें कितना कष्ट हुआ था, और अगर उस हिंसा को जारी रहने दिया जाता, तो भारत अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई का नैतिक आधार खो देता, जिस लड़ाई को उस समय तक काफी हद तक अहिंसक रखा गया था।

उस समय अंग्रेज़ों से लड़ रहे अन्य देशों के मुकाबले भारत में शासन के ख़िलाफ़ (स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़) हिंसा काफी कम हुई थी।

गांधीजी ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सेना के सहभाग का विरोध नहीं किया, क्योंकि वो भारतीय शासन के प्रति भारतीय सेना की वफ़ादारी का महत्व समझते थे, भले ही देश का शासन किसी के भी हाथों में हो।

गांधीवाद की इन बारीकियों को आज कोई नहीं समझता।

कई लोगों गांधीजी की आलोचना में कहते हैं कि अगर गांधीजी ने हिंसक आंदोलन को रोका नहीं होता, तो भारत बहुत पहले आज़ाद हो गया होता।

गांधीजी की दूरदृष्टि के कारण ही आज हम एक अहिंसक समाज में रह रहे हैं।

मैं अपनी ज़िंदग़ी की परेशानियों को दूर करने के लिये भी इसी प्रकार की दूरदृष्टि और गांधीवाद के सिद्धांतों को अपनाती हूं।

आपकी नज़र में मई 17 के आपके ट्वीट को ग़लत दिशा दिये जाने और ग़लत समझे जाने का कारण क्या है? क्या ये राजनीतिज्ञों के लिये कुछ दिनों की सुर्खियाँ बटोरने का एक मौका था?

मुझे इसका कारण अब तक समझ में नहीं आया क्योंकि मई 17 को यानि कि इसे पोस्ट किये जाने के दिन इसे किसी ने ग़लत नहीं समझा था।

मई 31 तक इसपर किसी ने आपत्ति नहीं जताई।

क्या हमारे देश में (असली) मुद्दों (और उन्हें उठाने) की कोई कमी है? क्या भारत में, या मुंबई में या महाराष्ट्र राज्य में इससे बड़ा कोई मुद्दा ही नहीं बचा है?

आप बस दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि आपने एक व्यक्ति को सज़ा दिलवाई क्योंकि आपको गांधीजी (गांधीवादी सिद्धांतों) का ख़्याल है।

अगर उन्हें गांधी के सिद्धांतों की ज़रा भी समझ होती तो अगर मेरा मतलब सचमुच '30.1.1948 के लिये धन्यवाद, गोडसे' भी होता (इसी दिन नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, सुश्री चौधरी ने अपने ट्वीट में आधुनिक भारत में गोडसे की बढ़ती लोकप्रियता पर व्यंग्य के रूप में इस वाक्य को लिखा था, जिस पर काँग्रेस और राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के नेताओं की ओर से ज़ोरदार राजनैतिक कोलाहल मचा, और अंत में महाराष्ट्र सरकार ने चौधरी का तबादला जल एवं स्वच्छता विभाग में कर दिया) तब भी ये स्थिति पैदा नहीं होती।

अगर इन लोगों (मई 17, 2019 के मेरे ट्वीट के व्यंग्य और अर्थ को न समझ पाने वाले) को गांधीवाद के सिद्धांतों का ख़्याल होता, तो ये कतई ऐसा व्यवहार नहीं करते, जैसा इन्होंने किया।

उन्होंने गांधीजी का उससे कहीं ज़्यादा अपमान किया है, जितना उनके अनुसार मेरे ट्वीट से हुआ है।

कभी-कभी मैं सोचती हूं, कि मेरे ट्वीट को ग़लत दिशा देने में 15 दिन की देर क्यों हुई।

साफ़ दिखाई देता है, कि यह किसी की काली करतूत है।

क्या आपने अपने नये काम को अपना लिया है?

इस घटना (ट्वीट पर विवाद) के समय मैं अपने दो बच्चों और परिवार के साथ सिक्किम में अपनी पहले से ली गयी छुट्टियाँ बिता रही थी।

बाहर होने के कारण मैं इसका सही समय पर जवाब नहीं दे पाई।

मैंने इस ट्वीट पर सबसे पहले आपत्ति जताने वाले काँग्रेस के कॉर्पोरेटर श्री सूफ़ियन को मेरी स्थिति समझाई (कि यह ट्वीट एक व्यंग्य था)

उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्होंने मेरे ट्वीट को ग़लत समझा था।

और उन्होंने अपना ट्वीट भी डिलीट कर दिया (जिसमें उन्होंने सुश्री चौधरी के ट्वीट की आलोचना की थी)।

इसके बाद जीतेंद्र आव्हाड सामने आये, शरद पवार सर भी... पता नहीं क्यों...

मई 31 से आपके ट्वीट पर राजनैतिक कोलाहल मचने के बाद आपकी ज़िंदग़ी और दिनचर्या में क्या बदलाव आये हैं?

मैं जहाँ तक संभव हो, अपनी ज़िंदग़ी को सामान्य बनाने की कोशिश कर रही हूं; मुझे पहले भी चेताया गया था कि बोलने की आज़ादी की भी कीमत चुकानी पड़ती है।

मेरा मानना है कि दफ़्तरशाह और जनसेवक सरकार के बनाये नियमों से बंधे होते हैं।

हमें अपने सार्वजनिक जीवन के व्यवहार को नियमों (दफ़्तरशाहों की जनसेवा से जुड़े नियम) के अनुसार ढालना पड़ता है, जिनमें साफ़ लिखा है कि हम सरकार की नीतियों का विरोध नहीं कर सकते।

आप मेरी पूरी टाइमलाइन देख सकते हैं, आपको कहीं भी कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखेगी, जिसमें राज्य सरकार के लिये कोई आपत्तिजनक बात कही गयी हो या जो दफ़्तरशाहों की सेवा के नियमों के ख़िलाफ़ हो।

हमारी निष्ठा भारतीय संविधान की ओर है... किसी एक राजनैतिक पार्टी की ओर नहीं; हम भारत के संविधान और भारत देश के प्रति वफ़ादार हैं।

अगर आप मेरा ट्विटर हैंडल देखें, तो आपको मेरे नाम के आगे चार धर्मों के चिह्न दिखाई देंगे।

कोई कैसे मान सकता है कि मैं राष्ट्रपिता का अपमान करूंगी?

मेरा दिल भारत देश को और मेरी आत्मा मानवता को समर्पित है।

ये लोग (राजनेता) कैसे सोच सकते हैं कि मैं गोडसेवादी (नाथूराम गोडसे के सिद्धांत को मानने वाले, जिसने महात्मा गांधी की हत्या इसलिये की थी, क्योंकि उसे लगता था कि गांधीजी हिंदुओं के ख़िलाफ़ और पाकिस्तान के साथ हैं) हो सकती हूं।

आप मुझ गांधीवादी (गांधी के सिद्धांतों को मानने वाले) होने की सज़ा दे रहे हैं।

मेरे महाराष्ट्र के बाहर होने और सही समय पर सफ़ाई न दे पाने के कारण इस मुद्दे को ज़रूरत से ज़्यादा भड़का दिया गया।

बड़ी ही हास्यास्पद बात है कि आज मुझे गांधी और अपने देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित करना पड़ रहा है।

अब सिक्किम से वापस आने के बाद, क्या आप राज्य सरकार द्वारा भेजी गयी कारण बताओ सूचना का जवाब देंगी?

जैसा कि मैंने आपसे पहले कहा, हम (दफ़्तरशाह) भारत राष्ट्र और भारतीय संविधान के प्रति निष्ठावान हैं और मैं ज़रूर उन्हें (कारण बताओ सूचना का) जवाब दूंगी।

मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि मैंने सरकार या संविधान के लिये कोई अपमानजनक बात नहीं कही है।

मैंने जो भी लिखा (मई 17 के ट्वीट में, जिसे अब सुश्री चौधरी ने डिलीट कर दिया है) इसलिये लिखा, क्योंकि आजकल लोगों को गांधीजी के सिद्धांतों और मूल्यों का अपमान करते देख मुझे बहुत दुःख होता है।

और यह सब कुछ तब हो रहा है जब हमारा देश महात्मा गांधी का 150वाँ जन्मदिन मना रहा है (गांधीजी का जन्म अक्टूबर 2, 1869 को हुआ था)

क्या आपको याद है कि जनवरी 30 (2019) को एक औरत (हिंदू महासभा की, जिस संगठन का हिस्सा गोडसे भी थे) ने गांधीजी की तसवीर पर गोली चलाई थी (1948 में इसी दिन नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की थी)

मुझे गांधी से नफ़रत भी होती तो भी मैं जनवरी 30 को ऐसा काम नहीं करती!

मैंने बड़े ही दुःख के साथ मई 17 को ट्वीट किया था और मुझे गांधीवादी होने के कारण ही निशाना बनाया जा रहा है।

Nidhi Choudhari

फोटो: लोक सभा चुनाव में मतदान के बाद उंगली पर लगी स्याही दिखातीं निधि चौधरी। फोटोग्राफ: Nidhi Choudhari/Twitter के सौजन्य से

2019 में महात्मा की 150वीं सालगिरह पर सत्यमेव जयते, अहिंसा सत्याग्रह जैसे गांधीजी के सिद्धांत कहाँ तक जीवित हैं?

70 साल बाद भी, गांधीजी के सिद्धांत आज भी भारत को राह दिखा रहे हैं।

और मैं शब्दों में नहीं बता सकती कि आज 21वीं सदी में हमें उनकी कितनी ज़्यादा ज़रूरत है।

19वीं सदी में हम एक शक्तिशाली सत्ता (अंग्रेज़ी शासन) से लड़ रहे थे।

आज हम एक-दूसरे के लिये नफ़रत से भरे दिलों से लड़ रहे हैं।

यह सिर्फ भारत में ही नहीं, हर जगह हो रहा है।

हम एक बार फिर एक-दूसरे को जाति, मज़हब, संप्रदाय, धर्म, लिंग के चश्मे से देखने लगे हैं और इन सभी चीज़ों को गांधीजी के सिद्धांत ही दूर कर सकते हैं।

आज हममें बस यही कमी है कि हम एक-दूसरे से प्यार करने के लिये तैयार नहीं हैं।

हम अपने मन को शांति नहीं देना चाहते।

हमारी आज़ादी की लड़ाई के गंभीर वातावरण में भी गांधीजी का मन शांत था।

इसलिये उनमें अहिंसा की राह पर चलते हुए भारतीय लोगों को अंग्रेज़ों से लड़ने के लिये एकजुट करने की ताकत थी।

इसलिये हमें आज भी गांधीजी के उन्हीं सिद्धांतों की ज़रूरत है, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हमारे लिये अहम भूमिका निभाई थी।

पूरी दुनिया में आज हिंसा मानवता पर भारी पड़ रही है।

श्रीलंका में (21 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में कम से कम 257 लोग मारे गये और 500 लोग घायल हुए), न्यू ज़ीलैंड में (जहाँ एक श्वेत प्रधानतावादी ने मस्जिदों पर हमला करके 51 मुसलमानों की हत्या कर दी) घटी घटनाओं के ज़ख़्मों को भरने के लिये हमें गांधी जैसे दिल वाले लोगों की ज़रूरत है।  

हिंसा से ऐसी घटनाओं को सिर्फ कुछ समय के लिये दबाया जा सकता है; लंबे समय तक मानवता के घाव भरने का काम सिर्फ अहिंसा और शांति ही कर सकती है।

दुनिया को आज गांधीजी की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

2019 में एक नये गांधीजी का जन्म होना चाहिये। 

प्रसन्ना डी ज़ोरे
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