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टोटल धमाल रिव्यू: अनिल-माधुरी एक बेहतर फिल्म के हकदार थे!

Last updated on: February 25, 2019 16:45 IST

सुकन्या वर्मा बताती हैं कि, टोटल धमाल में अगर माधुरी ग़ुस्सैमल और रौबदार न होती और अगर अनिल कपूर का पेट में बल डालने वाला किरदार न होता तो फिल्म में न कुछ बचता न ही यह देखने लायक होती।

Total Dhamaal

घटिया कॉमेडी को झेलने के लिए जब कहा जाता था कि आप दिमाग घर पर छोड़ कर आएं तो इसमें कोई दम वाली बात नहीं समझी जाती थी। लेकिन आज यही बात दर्शकों की भीड़ खींचती है।

बहुत आत्म-नियंत्रण की आवश्यकता होती है, जब ऐसे कथानक को रोकने या इस तरह की बेहुदा कहानी बॉलीवुड की कुछ सर्वेश्रेष्ठ प्रतिभाओं को समझनी हो।

धमाल सीरीज़ की उनकी पहले वाली फिल्मों की तरह, डायरेक्टर इंद्रा कुमार ने टोटल धमाल में भी दिमाग की ज़रूरत नहीं है वाला ही फार्मूला अपनाया।

इसमें किरदार न जाने कहां से आते हैं और न जाने कहां चले जाते हैं और अचानक ही ये किसी ओर बढ़ने लगते हैं, यह तो ऐसा है मानो दो घंटे तक कार और वाइल्ड लाइफ के चैनलों को रिमोट लेकर बदलते रहे हों।

अगर धमाल को हॉलीवुड की फिल्म It's a Mad, Mad, Mad, Mad World का बड़ा हिस्सा ले लिया, तो डबल धमाल को सिर्फ बचा हुआ व्यंग्य मान सकते है।

टोटल धमाल में दूसरी वाली की गलतियां नहीं हैं और यह धमाल वाले ही जांचे-परखे फार्मूले पर बनी है और यह फार्मूला अपने आप में It's a Mad, Mad, Mad, Mad World का फार्मूला है ।

बावजूद इसके कि इंद्र कुमार की व्यापक कॉमेडी के ब्रांड यह एहसास नहीं कर पाए  कि जबरदस्त सेट का होना, इसके सभी बुदबुदाते इंसान और लंपट बातें इसे चला सकते है।

इसमें हंगामा बहुत है, लेकिन थोड़ा सुलझा हुआ है क्योंकि मुख्य किरदार मसख़रेपन पर आ जाते है।

पैसे की फिराक में रहने वाली चार मूर्ख जोड़ियां अपने लूट का सामान छुपाने के लिए एक चिडि़याघर की तरफ भागते हैं – एक जोड़ी जिसका हाल ही में तलाक हआ है (अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित नेने), पल-पल गलतियां करने वाले भाइयों की एक जोड़ी (जावेद जाफरी, अरशद वारसी), एक छिछोरा और उसका साथी (रितेश देशमुख, पितोबाश त्रिपाठी), और एक तगड़ा लुटेरा और उसका साथी (अजय देवगन, संजय मिश्रा) ।

इनका पीछा करते हुए एक भ्रस्ट सिपाही और उसका साथी (बोमन इरानी, ​​विजय पाटन)।

कारें, हैलीकॉप्टर, हवाई जहाज़, पैराशूट, मोटर साइकिलें, जीपें - आप जो कहें वह सब कुछ है  - भि‍ड़ंत, गिरना और जलना, बनती हुई इमारतों पर आग, झरने, लकड़ी के  पुल, और दूर दराज के रेगिस्तान – यह सब कुछ टोटल धमाल के इन्ट़रवल से पहले का भाग है।

अगर इसकी मैकेनिकल इंजीनियरिंग आपको बुरा सपना ना लगे तो दुसरे हाफ में इसके जंगली जानवरों का उत्पात आपको दिमागी दरारें दे सकता है, लेकिन अगर आपके भीतर चार साल का बालक है तो इसके सैकेन्ड हाफ में जानवरों की चालबाजि़यां आपको लुभाएंगी ।

भगवान भला करे, आपका मस्ती का आईडिया हाथी की उलटी ना लगे । 
या फिर 'मद्रासी' लड़ाई 
या तो शादी की लड़ाई ।

टोटल धमाल में कुछ द्विअर्थी तो नहीं है, लेकिन बॉलीवुड में सदा से चले आ रहे घिसेपिटे जातिवादी और जोरू के गुलामों के चुटकुले हैं ।

इसमें एक और खामी है कि इसमें कम्यूटर ग्राफिक्स का भारी भरकम प्रयोग है । वीएफक्स से बनाए आसमानी सीन और हैरतअंगेज स्तर के असंभव जानवरों का चिडि़याघर बिलकुल नकली लगता है ।

इसमें जो इधर उधर की बातें दिखाई गई हैं उनमें फूहड़ता ही है । इनमें से किसी में अजय देवगन नहीं हैं और तो और भरोसेमंद संजय मिश्रा हर वाक्य पर अपने भाई के साथ ही अटके मिलते हैं। रितेश और पिताबोश भी ऊधम मचाए रखते हैं ।

बॉलीवुड का प्रिय भि‍डु जीपीएस सर्विस देता है जिसकी चली आ रही चिंदी टाइप की भाषा मसखरी बढ़ाती है। जावेद जाफरी पर हंसी आती है। अरशद वारसी के सांप वाला  बचाव बचकाना है लेकिन हां इसमें थोड़ा-बहुत दम है । जॉनी लीवर का केमियो हमेशा के जैसा ही है ।

अनिल और माधुरी का वन टू का फोर पर हैट उतारना वाकई कुछ याद दिलाता है । जोड़ी हमेशा की तरह बेजोड़ है और खराब स्क्रिप्ट के बावजूद काम अच्छा दिखता है ।

अगर इसमें माधुरी का रोल इतना रोबदार और गुस्सैमल टाइप का न होता तो टोटल धमाल में देखने लायक कुछ न होता और अनिल कपूर का पेट में बल डालने वाला रोल न होता तो यह आधी भी न रही होती ।

इस जोड़ी को बेहतर फिल्म चाहिए। और यह जानने के लिए आपको दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है ।

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सुकन्या वर्मा
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