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द वॉर रीव्यू

Last updated on: October 07, 2019 09:19 IST

वॉर  स्टार पावर पर आधारित एक पेशकश है, जिसमें ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ़ को पहली बार एक साथ लाया गया है और उन दोनों की गुरू-चेले वाली एनर्जी का इस्तेमाल करते हुए हमें जासूसी, ऐक्शन और दोस्ती एक दुनिया दिखाई गयी है, सुकन्या वर्मा ने कहा।

The War review

हिंदी मूवीज़ का एक नया जॉनर बनता जा रहा है।

जिसे लोग मसाला  समझ लेते हैं।

लेकिन तर्क से परे हर चीज़ मसाला  नहीं होती। मसाला मूवी बनाने के लिये ज़्यादा बड़े पैमाने पर मसालों की ज़रूरत पड़ती है, जबकि इसे श्रेय काफ़ी कम दिया जाता है।

मैं बात कर रही हूं स्टार्स की।

इस सब-जॉनर में मूवी के स्टार ही आपके पैसे वसूल करने के लिये काफ़ी होते हैं।

भले ही फिल्म कितनी भी बकवास क्यों न हो (जैसे एक शातिर ऑफ़िसर को पता चलता है कि उसके अधीन काम करने वाला कर्मचारी दायीं ओर नहीं देख पाता, और वहीं पहाड़ों में होली डांस का दृश्य शुरू हो जाता है) आप अपनी सीट से नहीं हिलेंगे, सितारों का प्रभाव इतना ज़्यादा होता है।

आलसी फिल्ममेकिंग को एक और नयी पहचान देने वाली यह कहानी दर्शकों के सिनेमा प्रेम की गवाही देती है।

वॉर  ऐसे ही स्टार पावर पर आधारित एक पेशकश है, जिसमें ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ़ को पहली बार एक साथ लाया गया है और उन दोनों के गुरू-चेले वाली एनर्जी का इस्तेमाल करते हुए हमें जासूसी, ऐक्शन और दोस्ती की एक दुनिया दिखाई गयी है।

वॉर  में पूरी दुनिया की ख़ूबसूरत झलकियों, हाइ-टेक गिज़्मोज़ और प्रभावशाली सेट पीसेज़ से भरी कहानी पुर्तगाल, इटली, फ़िनलैंड, स्वीडन और कभी-कभी भारत के बीच इतनी तेज़ी से घूमती है कि आपको दिमाग चलाने का समय ही नहीं मिल पाता।

प्लेन्स, कार्स, बोट्स, बाइक्स... फास्ट ऐंड फ़्यूरियस बनने की इस कोशिश में किसी भी वाहन को बख़्शा नहीं गया है।

पर्दे पर विद्यार्थी और जासूस शायद ही कभी बदसूरत दिखाये जाते हैं।

वॉर  में इन्हें शानदार हिप हेयरकट्स, कसी हुई शर्ट्स, आकर्षक कपड़ों और सेना से प्रेरित शानदार फ़ैशन सामग्रियों से सजा हुआ दिखाया गया है।

इसमें दिखने वाली सबसे सस्ती कार भी मर्सिडीज़ ही होगी।

ऐसा लगता है कि पर्दे पर दिखने वाला हर डोले-शोले वाला मर्द प्रोटीन शेक्स और क्विनोआ सलाद की सख़्त डाइट पर है, जिनमें से एक खाल ड्रोगो जैसा दिखने वाला इंसान भी है।

सिर्फ डायरेक्टर सिद्धार्थ आनंद को ही चीट डेज़ की अनुमति दी गयी है।

उनकी कहानी -- जिसके लेखन में प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा ने और स्क्रीनप्ले लिखने में श्रीधर राघवन ने उनका साथ दिया है -- काफ़ी हद तक हॉलीवुड की फिल्मों नोवेम्बर मैन  और मिशन: इम्पॉसिबल 2 से प्रभावित लगती है, जिसमें आख़िरी रास्ता, डॉन: द चेज़ बिगिन्स अगेन और कहानी-में-ट्विस्ट के गुरू अब्बास-मस्तान की फिल्मों जैसा देसी तड़का लगाया है।

अब्बास टायरवाला के डायलॉग्स उनके नाटकीय अंदाज़ की झलक देते हैं।

या फिर मैं कहूं कि ये फिल्म की शोभा बढ़ाते हैं?

सिद्धार्थ आनंद को कभी वास्तविकता दिखाने के लिये नहीं जाना गया है - वाणी कपूर का मोटरबोट पर एक संदिग्ध इंसान से मिलने जाने का सीन पूरी तरह एमआइ2 में थैन्डी न्यूटन के स्लो-मोशन अंदाज़ में दिखाया गया है, दोनों दृश्यों में कोई भी अंतर नहीं है।

लेकिन तगड़े, दमदार अभिनेताओं को फिल्मों में लेने के लिये उन्हें ज़रूर जाना जाता है।

निराशाजनक बात है कि उन्होंने टेक्स्टबुक कास्टिंग और बड़े बजट्स के अपने हुनर को एक ऐसी कमज़ोर कहानी पर खर्च किया है, जो अपने एक मुख्य किरदार को असहाय तो दूसरे को अपनी ही तदबीरों के सहारे छोड़ देती है।

ऐसा लगता है जैसे आनंद को बस दो योग्य अभिनेता मिल गये और उन्होंने बाक़ी चीज़ों पर ध्यान न देने का फ़ैसला कर लिया।

और इसका नतीजा है बड़े खर्च पर बनी एक बकवास कहानी, जो सिर्फ वास्तविकता के प्रेमियों को दिखाई देगी, जबकि और सभी लोग बस ऋतिक रोशन को देखने में व्यस्त होंगे।

क्योंकि ऋतिक रोशन इतने फौलादी इससे पहले कभी नहीं दिखे हैं।

रोशन की हरी आँखें उनके भड़कीले, सशक्त और धूप में झुलसे हुए शरीर की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती हैं, जबकि उनकी दृढ़ता उन्हें एक प्रभावशाली, चालाक व्यक्तित्व देती है, जो टाइगर श्रॉफ़ को प्रेरणा देने के लिये बिल्कुल सही लगती है।

टाइगर एक विरोधाभास पेश करते हैं।

और इसमें उनकी ग़लती नहीं है। उन्होंने डांस से लेकर ढिशूम-ढिशूम तक हर कदम पर ऋतिक रोशन की बराबरी की है।

उनकी केमिस्ट्री साफ़ दिखाई देती है, भले ही इसे पूरी तरह विकसित न किया गया हो, लेकिन कई बार यह बेहद ख़ूबसूरत लगती है।

'लाइन में लग जाओ' टाइगर ऋतिक की एक और दीवानी को आँख मारते हुए कहते हैं (ध्यान दीजियेगा कि उनके एन्ट्री सीने में सारे लड़के उन्हें कैसे देखते हैं) जब वह अपने ख़ूबसूरत बॉस के साथ भाग जाने की इच्छा जताती है।

अपने वरिष्ठ अधिकारी का विश्वास जीतना हो, या अपनी माँ (छोटी लेकिन दमदार भूमिका में सोनी राज़दान) को ढाढ़स बंधाना हो, टाइगर अपनी बातों में भावनाओं को घोलने में सफल रहे हैं। लेकिन उन्हें वॉर  की ढीली-ढाली कहानी में एक घिसा-पिटा ट्विस्ट डालने के लिये मूर्ख बना दिया गया है।

वह फिर भी वाणी से बेहतर हैं।

वॉर  में वाणी के कपड़े उसके सीन्स से ज़्यादा हैं।

लेकिन आपको इनमें से किसी चीज़ का अफ़सोस नहीं होता, जब आपका पूरा ध्यान एक ख़ूबसूरत सितारा अपनी ओर खींच लेता है।

क्योंकि मोहब्बत और वॉर में सब जायज़ है। 

 

Rediff Rating:
सुकन्या वर्मा