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ड्रीम गर्ल रीव्यू

September 15, 2019 12:38 IST

हँस-हँस कर आपके पेट में दर्द हो जायेगा, सुकन्या वर्मा ने वादा किया।

मर्दों का लड़की बने लड़के पर फ़िदा हो जाना एक पुराना मज़ाक है।

हॉलीवुड की सम लाइक इट हॉट  की मज़ेदार मिलावट रफ़ू चक्कर  में ऋषि कपूर और पेंटल के लड़कियों वाले किरदार पुरुषों और महिलाओं, दोनों का दिल जीत लेते हैं।

चाची 420 में अमरीश पुरी अपनी पोती की आया बने अपने दामाद को रिझाने के लिये अपनी प्यारी मूंछें मुंडवा देते हैं।

गोविंदा की भलाई उसे भारी पड़ जाती है, जब उसका आंटी नं. 1 का रूप कादर ख़ान और सईद जाफ़री का मन मोह लेता है।

खिलाड़ी  में एक ड्रेस में सजे दीपक तिजोरी अपने कॉलेज कोच टीनू आनंद के दिल को मचलने पर मजबूर कर देते हैं, तो अपना सपना मनी मनी  के अनुपम खेर अपने संस्कारी तौर-तरीके भूल जाते हैं, जब उनका दिल रितेश देशमुख के रूप पर आ जाता है।

ड्रीम गर्ल  में भी टेलीफोन पर 'पूजा स्पीकिंग' की प्यारी आवाज़ सुन कर कई दिल मचल उठते हैं।

यह नखरे भरी आवाज़ करम (आयुष्मान खुराना) की है, जो ज़रूरत पड़ने पर स्वेटर पर मोर बनाने के लिये तैयार एक ज़रूरतमंद लड़का है।

फिर भी हमें ऐसा ज़रूर लगता है कि मथुरा के छोटे से शहर में नौकरियों की कमी या एक बकाया लोन ही उसके एक इस बदनाम फ्रेंडशिप कॉल सेंटर में शामिल होने का कारण नहीं था -- ग़ुलाबी दीवारों वाले क्युबिकल्स से भरा एक बंद कमरा, जहाँ साड़ी पहने आंटियाँ बैठ कर स्वेटर बुनते और सब्ज़ियाँ काटते हुए अति कामुक अजनबियों से बात करती थीं।

अच्छे लेखक और पहली बार डायरेक्टर की भूमिका में आये राज शांदिल्य की ड्रीम गर्ल  उनकी मज़ेदार दुविधा और इस तरह के झूठे प्यार की मसखरी की कहानी बयाँ करती है, जिसमें ठहाके वाले पलों की कमी नहीं है।

साथ ही यह अपने नारीवादी और जनाना रूप से जुड़े एक लड़के की भी कहानी है, जिस बात को वह छुपाता है, और समाज के लिंग से जुड़े नियमों के कारण उसे इस बात के लिये नीचा दिखाया जाता है।

उसके बचपन की झलकियों से पता चलता है कि वह लड़कियों के रोल आसानी से निभा सकता है।

अपने सबसे अच्छे दोस्त को मुसीबत से बचाने के लिये लड़की की आवाज़ में बात करने से लेकर अपने पड़ोस में स्टेज पर सीता और राधा बन कर नाम कमाने तक, करम ने अपने भीतर पूजा नाम के किरदार को पाल रखा है, जिसे वह हमेशा दुनिया से बचाता है और उसका पूरा साथ देता है।

हम एक बार फिर आयुष्मान खुराना से सरप्राइज़ेज़ और जलवों की उम्मीद लेकर आये थे। 

और एक बार फिर, इस अभिनेता ने हमें निराश नहीं किया और दोनों ही किरदारों को बड़ी आसानी से निभाया।

आलोचक समाज द्वारा लज्जित किये गये एक व्यक्ति के किरदार की उनकी समझ में शांति भी है और उथल-पुथल भी, और एक अजीब भूमिका को उन्होंने बड़े आराम से कर दिखाया है।

जहाँ उनकी 'पूजा' वाली आवाज़ लोगों को हँसाती है वहीं महाभारत के व्यंग्य के बीच उपदेश देने जैसा उनका हुनर उनके मनमौजी अंदाज़ को दर्शकों को सामने लाता है।

ड्रीम गर्ल  की कहानी जितनी दिलचस्प है, शांदिल्य ने उतनी ही सावधानी से इस नाज़ुक मुद्दे को छुआ है और मस्ती पर ध्यान देने का फैसला किया है। कई बार हम इसमें पूरी तरह खो जाते हैं।

हालांकि कुछ रोमांचक न करने की उनकी चाह निराश करती है, लेकिन ख़ूबसूरत बात यह है कि ड्रीम गर्ल  में मज़ाक कहीं भी घटिया और अभद्र स्तरों पर नहीं गया है।

कई ऐसे इशारे ज़रूर हैं (जिसे ताजमहल समझ रहे हो, वो क़ुतुब मीनार है)। लेकिन हिंदी मूवी में लड़की बने लड़के का स्तनों के चुटकुलों या नामर्दी के ज़िक्र से दूर रहना नयी बात है।

बल्कि ड्रीम गर्ल  की साफ़-सुथरी कामुकता अकेले, निराश कॉलर्स पर ध्यान देती है, जो पूजा की चतुराई और सहानुभूति से दिल लगा बैठे हैं।

और कहना पड़ेगा कि इन कॉलर्स ने फिल्म को और भी मज़ेदार बना दिया है।

ऑरेंज डाय किये हुए पॉम्पाडोर बाल और गर्दन के पीछे गुज्जर टैटू (उसके दूसरे टैटू में पूजा की स्पेलिंग Pujja उसके गुज्जरपने को और भी बेहतर तरीके से दिखाती है) के साथ, राज भंसाली के नाटे, मवाली किरदार का भौंकना और काटना दोनों ही मज़ेदार है।

स्त्री  से प्रसिद्ध हुए अभिषेक बैनर्जी कुछ समय के लिये ब्रह्मचारी बने लड़के के किरदार में हैं, जो बात-बात पर राजेश खन्ना - आरडी के गाने शुरू कर देता है।

निधि बिष्ट का शक्तिशाली व्यक्तित्व उनके किरदार की मर्दों से नफ़रत और यौन संबंधी पसंद बदलने जैसे व्यवहार पर सही लगता है।

विजय राज़ और अन्नू कपूर बेहद आसानी से अपना जलवा बिखेरते हैं।

चिड़चिड़े पुलिसवाले और एक झगड़ालू पत्नी से ब्याहे गये घटिया कविताऍं सुनाने वाले कवि के रूप में राज़ की कलाकारी लाजवाब है। आप उनकी घटिया शायरी से प्रभावित हों या न हों, लेकिन उनकी बातों पर आपको हँसी तो ज़रूर आयेगी, 'पुलिस वाले भी घूस देने लगे तो पुलिसवाले कहाँ के?'

अन्नू कपूर का 'जगजीत सिंह से मेहदी हसन' तक का बदलाव और कुछ कुछ होता है  के शाह रुख ख़ान की नकल काफ़ी गुदगुदाती है। काश कपूर की ऊधम तक जाने वाली कहानी भी थोड़ी विश्वसनीय होती।

कुछ चीज़ों को खींचा भी गया है।

जैसे मुस्लिम प्रथाओं का मज़ाक, अभिषेक बैनर्जी की दाढ़ी पर कई आयुवादी चुटकुले या कहानी में राज़ के ग़ुस्सैल बॉस को बेमतलब शामिल करना।

मुस्कानों की बात करें, तो फिल्म में स्माइली भी है, करम का बचपन का दोस्त।

मनजोत सिंह और उसके वन लाइनर्स -- 'हर सरदार का नाम हरप्रीत, गुरमीत नहीं होता' -- काफ़ी बकवास लगते हैं।

राजेश शर्मा का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है, जो एक झूठी हॉटलाइन सर्विस के कपटी मालिक हैं और अपनी सोने की चिड़िया को खोना नहीं चाहते।

मस्ती और संदेशों के इस संगम में, शांदिल्य को 132 मिनट में हर मुद्दे पर पूरी पकड़ नहीं मिल पायी है।

कई बार, ड्रीम गर्ल  एक ओर तो अकेले भारतीय मर्दों की तरफ़ सहानुभूति दिखाती है, दूसरी ओर ख़ुद के ख़िलाफ़ जाकर मर्द होने के अहंकार के लिये उनपर प्रहार भी करती है। साथ ही लिंग भेद पर इस फिल्म के विचार पूरी तरह समझ नहीं आते।

जहाँ एक ओर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को बस ऑफ़िस बोर्ड पर नाम लिख कर सराहना दी जाती है, वहीं कुछ ही दिन से काम पर लगे करम को एक कार और अपनी मर्ज़ी से काम करने की छूट मिल जाती है।

यही बात उसके और खुले दिमाग़ वाली नुसरत भरुचा (अच्छा अभिनय, लेकिन बहुत ही छोटा रोल) के थोड़ी देर चलने वाले तेज़ रोमांस पर भी लागू होती है। एक अजीब स्थिति को उसका आसानी से स्वीकार कर लेना इस बात की गवाही देता है, कि उसे फिल्म में बस हीरो की असामान्यता से ध्यान हटाने के लिये लाया गया है।

ड्रीम गर्ल  बहुत सारी मज़ेदार रास्तों पर चलती है, और हर जगह सफलता के झंडे गाड़ कर लौटती है।

हो सकता है कि यह फिल्म का सबसे अच्छा विवरण न हो, लेकिन यह बात पक्की है कि हँस-हँस कर आपके पेट में दर्द हो जायेगा।

और यह बात कभी बुरी कैसे हो सकती है?  

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सुकन्या वर्मा