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स्टूडेंट ऑफ़ द इयर 2 रीव्यू: बकवास ऑफ़ द इयर!

May 11, 2019 21:43 IST

'स्टूडेंट ऑफ़ द इयर 2 में न कोई मज़ा है, न कोई कहानी है और न ही कोई आकर्षण है,' सुकन्या वर्मा ने अफ़सोस जताया।

Student of the year 2 - Tiger Shroff

बॉलीवुड मूवीज़ में कॉलेज कभी पढ़ाई करने की जगह नहीं थी। कॉलेज के नाम पर हमेशा हमारी थाली में छिछोरापन ही परोसा जाता है।

सात साल पहले आयी स्टूडेंट ऑफ़ द इयर  में करन जोहर ने कैम्पस में अपनी जादू की छड़ी घुमा कर इसे कैफेटेरिया, आधुनिक क्लासरूम्स और डिस्को डांसिंग तथा ट्रेज़र हंट जैसे टूर्नामेंट्स के साथ आपके मनपसंद रोमांस, दुश्मनी और फैशन का अड्डा बना दिया था।

कुछ ज़्यादा ही तड़क-भड़क के बावजूद, स्टूडेंट ऑफ़ द इयर  में कम से कम आलिया भट्ट, वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा के दर्शकों को खुश करने के लिये तैयार नये चेहरों की ख़ूबसूरती और जादुई अंदाज़ का तड़का ज़रूर था।

पुनीत मल्होत्रा द्वारा डायरेक्ट की गयी धर्मा  की बिल्कुल नयी बैच की बागडोर कमज़ोर हाथों में थमा दी गयी है।

स्टूडेंट ऑफ़ द इयर 2 में न कोई मज़ा है, न कोई कहानी है और न ही कोई आकर्षण है।

इसमें कुछ है, तो बस कुछ घमंडी और मूर्खों के बीच की दुश्मनी, और जो जीता वही सिकंदर  के जैसी राजनीति को दिखाने की नाकाम कोशिश, लेकिन इस मूर्खतापूर्ण कहानी की उससे कोई तुलना ही नहीं की जा सकती।

स्टूडेंट ऑफ़ द इयर फ्रैंचाइज़ को जारी रखने की इस फूहड़, घटिया कोशिश में, सेंट टेरेसा के अमीरज़ादों को पिशोरीलाल चमनदास के दमदार अंडरग्रैड से चुनौती महसूस होती है।

यह अनोखी दुनिया बंदरों और मैनेक्विन्स से भरी हुई है। आपको किताबों से ज़्यादा स्पैन्डेक्स दिखाई देंगे। स्पोर्ट्स जॉक्स और चीयरलीडर्स से भरे फ्रेम्स के बीच कॉलेज का ड्रेस कोड फ़्लोरिडा बार्बी और बीच केन के बीच बँटा सा लगता है।

दोनों ही संस्थाओं के प्रतीकवाद में डूबे टीचर्स और प्रिंसिपल्स (समीर सोनी, मनोज पहवा) ऑडिशन्स में छाँटे गये स्टैंड-अप कॉमेडियन और रेडियो जॉकी जैसे लगते हैं। बीच-बीच में आपको ग्यान बाँटते और उदास मुंह बनाये माता-पिता भी दिख जाते हैं, जिनके सीन्स सिर्फ बेकार के घिसे-पिटे गाने ज़बर्दस्ती ठूंसने के लिये डाले गये हैं।

स्टूडेंट ऑफ़ द इयर 2 का बजट भले ही अच्छा हो, लेकिन बजट को क्रिएटिविटी पर बिल्कुल खर्च नहीं किया गया है।

फिल्म लड़खड़ाती हुई चलती है। इसका प्लॉट कमज़ोर है। फ़्लाइंग जट, क्रिश के चुटकुलों  भी कुछ दम होगा, पर इस फिल्म का ह्यूमर आपको बिल्कुल हँसा नहीं पाता। और इसमें समृद्धि को फूहड़ तरीके से दिखाया गया है।

महँगे कपड़ों में लदा एक बच्चा जो रईस बना फिरता है, उसका पिता उसके क्लासमेट से सड़कछाप अंदाज़ में 'अबे तू?' करके बात करता दिखाई देता है।

इससे भी घटिया बात है इस फिल्म में लैंगिकता के रक्षक होने के झूठे दावे को परोसने का भद्दा तरीका। गुल पनाग (बेमतलब किरदार) ने एक लेस्बियन (समलैंगिक) का किरदार निभाया है, जिसकी साथी 'मैम की मैम' कहकर दुर्व्यवहार करने वाले एक विद्यार्थी को सीधा कर देती है।

इस पूरी कहानी के लिये आप रोहन (टाइगर श्रॉफ़) को दोषी ठहरा सकते हैं, जो अपने स्कूल वाले प्यार, मृदुला उर्फ मिया (तारा सुतारिया) को रिझाने के लिये देहरादून के सबसे भव्य कॉलेज में दाखिला लेता है। वह शहर की सबसे सादी बस्ती में रहती है, लेकिन उसके पिता के दो पेट्रोल पम्प टेरेसा की भारी फीस भरने के लिये काफ़ी हैं।

मिया को अपने बचपन के दोस्त से 'थोड़ा सा प्यार' है, जो छतों और सीढ़ियों पर कूदता-फांदता दिखाई देता है, अपनी कलाई पर उसका नाम लिखवा लेता है और स्पाइडरमैन बनकर रईसज़ादों की सुपरहीरो-थीम्ड पार्टीज़ में शामिल होता है।

जब हीरो का दौलत में मग़रूर भाई (आदित्य सील) और उसकी नाक में दम कर देने वाली बहन (अनन्या पांडे) हमारे हीरो की राह मुश्किल बना देते हैं, तब शुरू होती है उसकी फ़ीकी ऊपर उठने की लड़ाई, जो इंटर-स्कूल कबड्डी टूर्नामेंट का रूप ले लेती है, जिसका विजेता डिग्निटी कप और स्टूडेंट ऑफ़ द इयर का टाइटल जीतेगा।

मूवी का एक चौथाई हिस्सा कबड्डी के खेल की सबसे उबाऊ जानकारी से भरा है, जिसमें हर समय आपको कसे हुए कपड़ों में फूले हुए डोले-शोले दिखाते दो दर्जन लड़के दिखाई देंगे।

नयी तारिका अनन्या पांडे एनर्जी से भरी लगती है, हालांकि ऐसा लगता है जैसे वो अभी-अभी ला ला लैंड से निकल कर आई है। उसकी हिंदी सुनकर ऐसा लगता है, जैसे उसने अब तक हिंदी को किसी ताक पर धूल खाने के लिये छोड़ रखा था। लेकिन कम से कम उसकी अयोग्यता देखने लायक है।

दूसरी नयी तारिका तारा सुतारिया की लालची हरकत बड़े पर्दे पर देखी गयी अब तक की सबसे नीरस चालबाज़ी होगी। आदित्य सील इतना ज़्यादा मुस्कुराते हैं कि मुझे यकीन है, शूटिंग के बाद उन्हें चेहरे पर आइस पैक्स लगाने पड़ते होंगे।

टाइगर श्रॉफ़ अपने किरदार के लिये थोड़े से मुरझाये हुए लगते हैं, लेकिन फिर भी उनका काम उनके ढीले-ढाले को-स्टार्स से तो अच्छा ही है, जब तक कि उनके परफॉर्मेंस में डोले-शोले दिखाना शामिल न हो।

एंड क्रेडिट्स के गाने में आलिया भट्ट का बेमतलब दिखाई देना और जवानी रीमिक्स में विल स्मिथ का डांस एक तरह से पैसों की बर्बादी ही लगता है।

'ज्ञान ही धन है' सेंट टेरेसा का सिद्धांत है। और इसे अनदेखा करना स्टूडेंट ऑफ़ द इयर 2 का धर्म है।

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सुकन्या वर्मा