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लाल कप्तान रीव्यू

Last updated on: October 22, 2019 09:12 IST

लाल कप्तान  को सिर्फ सैफ़ के धमाकेदार प्रदर्शन के लिये एक बार ज़रूर देखना चाहिये, प्रसन्ना डी ज़ोरे ने तारीफ़ में कहा।

Laal kaptaan

डायरेक्टर नवदीप सिंह की दमदार नयी फिल्म लाल कप्तान  पूरी तरह नागा साधु का किरदार निभा रहे सैफ़ अली ख़ान के कंधों पर टिकी हुई है, और इस अभिनेता ने हमें निराश नहीं किया है।

सिंह ने मनोरमा सिक्स फीट अंडर  और NH10 के साथ नीरस कहानियों को मज़ेदार ड्रामा में बदलने की अपनी क्षमता को साबित किया है।

उन्होंने नागा साधु की इस कहानी के रूप में एक और इक्का फेंका है, जिसमें अपने पिता की मौत का बदला लेने निकले एक एक नागा साधु (ख़ान गोसाईं के किरदार में हैं, और भगवान शिव की पूजा करने वाले धर्म संप्रदाय नागा साधु का भूमिका निभा रहे हैं) की कहानी दिखाई गयी है।

अगर हॉलीवुड के पास वाइल्ड वेस्ट है, तो बॉलीवुड के पास मध्य भारत में स्थित चम्बल की घाटियाँ हैं और सिंह ने लाल कप्तान  के मुख्य किरदार को भीतर से खा रहे शांत ग़ुस्से को दिखाने के लिये बुंदेलखंड के उजाड़ और निर्जन हिस्से का इस्तेमाल किया है।

चम्बल घाटी की वादियों की शानदार झलक के लिये सिनेमेटोग्राफर शंकर रमण की तारीफ़ की जानी चाहिये। यमुना के हरे-भरे, बरसात से भीगे किनारे पर क्लाइमैक्स शानदार कलाकारी का एक उदाहरण है।

जबीन मर्चन्ट की एडिटिंग, हालांकि कई जगहों पर खिंची हुई है (फिल्म की लंबाई 150 मिनट से ज़्यादा है) लेकिन लड़ाइयों, दुश्मनी, धोखे और छल-कपट के बीच बदले और मोक्ष की मुख्य थीम को सही तरीके से पेश करती है।

सैफ़ का गोसाईं का किरदार नागा साधु (तपस्वी), जापानी सामुराय, पायरेट्स ऑफ़ द करिबियन  के कैप्टन जैक स्पैरो -- चपल मज़ाकिया अंदाज़ की कमी के साथ -- और उमा थुरमन की किल बिल  की बदले की तलाश में निकली तलवारबाज़ के किरदार का एक अच्छा मिश्रण है।

वह बदले का भूखा है और उसी बदले के पीछे एक कहानी छुपी है (इसके पीछे छुपा अर्थ जानने के लिये फिल्म ज़रूर देखें :))

फिल्म को बक्सर की लड़ाई (1764) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनाया गया है, जिसके बाद मध्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने क़दम जमाये थे, जो पलासी युद्ध (1757) के बाद हुई थी, जिसके दौरान नवाब सिराज-उद-दौला के सेनापति मीर जाफ़र ने उन्हें धोखा दे दिया था और बंगाल पर अंग्रेज़ों की हुक़ूमत जम गयी थी।

लाल कप्तान  के मीर जाफ़र रहमत ख़ान बने हैं (डरावने किरदार में मानव वीज, जो रानी -- ख़ूबसूरत ज़ोया हुसैन -- को छोड़ने की दया तो दिखाते हैं -- लेकिन अपनी पत्नी को नहीं -- बेमतलब किरदार में सिमॉन सिंह) और वही हैं, जिनसे गोसाईं को बदला लेना है।

इन सारे पत्तों में दीपक डोबरियाल को जोकर कहा जा सकता है, जो समुद्री लुटेरे हैं, जो लोगों के पास सोने के सिक्के या किसी भी क़ीमती चीज़ को सूंघ सकते हैं (जी हाँ, आपने सही पढ़ा)।

डोबरियाल का अभिनय बेहद शानदार है! सिनेमा का नुकसान ही कहा जा सकता है कि उन्हें ज़्यादा फिल्में नहीं मिलतीं।

डायरेक्टर सिंह ने कैप्टन स्पैरो की चपलता की जगह डोबरियाल का शानदार अभिनय डाला है।

इसके बाद आते हैं हमारे भरोसेमंद, आकर्षक (भले ही वो जटाओं में हों) ख़ान, जिन्होंने एक हास्यास्पद साफ़ा पहना हुआ है, उनका चेहरा राख से सना है और शरीर बेहद सेक्सी लग रहा है (नागा साधु ऐसे तो नहीं होते, पर इस बात का नुक्स नहीं निकाला जाना चाहिये)।

उन्होंने बदले के भूखे इस किरदार को पर्दे पर बख़ूबी उतारा है। वह हमेशा अपने शिकार, ताक़तवर रहमत ख़ान की तलाश में रहते हैं।

खान गोसाईं पर विश्वास करने के लिए उसको देखना जरूरी है।

मौत के सामने आने पर उनका शांत भाव, कारावास के दौरान उनका अपने दुश्मन को कठोर, अंगारों से भरी निग़ाहों से देखना, ज़ोया के प्रेम प्रस्ताव को ठुकराना इस किरदार की बदले और मोक्ष की चाह को हमारे सामने लाता है।

अगर आप सोच रहे हैं कि मैंने सोनाक्षी सिन्हा के पलक-झपकाते-ही-ग़ायब होने वाले किरदार की बात अब तक क्यों नहीं की, तो मैं माफ़ी चाहूंगा। उनके स्क्रीन पर आने के समय शायद मैंने पलक झपका ली थी।

लाल कप्तान  को सिर्फ सैफ़ के धमाकेदार प्रदर्शन के लिये एक बार ज़रूर देखना चाहिये। 

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प्रसन्ना डी ज़ोरे
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