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ब्लैंक रीव्यू: फ़ीका और बोरिंग

May 06, 2019 09:24 IST

 'बॉलीवुड की और फिल्मों की तरह ही ब्लैंक में भी घनी दाढ़ी, सुरमे वाली आँखों और सिर पर चेकर्ड स्कार्फ़ के साथ मुसलमानों की एक ख़ूंखार छवि दिखाने की कोशिश की गयी है, जो युवाओं में भटकी हुई धार्मिक सोच भरने का काम करते हैं, 'सुकन्या वर्मा ने बताया।

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111 मिनट तक लगातार अपने चेहरे की मांसपेशियों पर ज़ोर डालते सनी देओल से लेकर सीधे एंड क्रेडिट्स के समय अली अली चिल्लाने के लिये आये अक्षय कुमार तक, यह फिल्म एक स्टार रिश्तेदार के ढीले-ढाले लाँच पैड से ज़्यादा कुछ भी नहीं लगती

इसका नाम ब्लैंक  है, लेकिन बंक नाम भी इसके लिये बिल्कुल सही है।

प्रणव आदर्श की कहानी और स्क्रीनप्ले के साथ बेहज़ाद खंबाटा द्वारा निर्देशित इस कमज़ोर थ्रिलर में अपनी याद्दाश्त खो चुका एक आत्मघाती बॉम्बर अपने ज़मीर और अपनी ट्रेनिंग के बीच उलझा हुआ दिखाई देता है।

उसकी मानसिक उथल-पुथल में ब्लैंक  ने जो थोड़ी-बहुत पकड़ बनाई है, वो भी बेमतलब खुलासों की भूल-भुलैया में पूरी तरह भटक जाती है।

दाढ़ी और काली हूडी पहने एक युवा (करण कपाड़िया) शहर को नेस्तनाबूद कर देने के इरादे से निकला है कि तभी उसकी याद्दाश्त चली जाती है और आयरन मैन के इलेक्ट्रोमैग्नेट की तरह उसकी छाती में लगा बम उसे ऐंटी टेररिस्ट स्क्वॉड ऑफ़िसर (सनी देओल) के निशाने पर ला देता है।

सनी देओल के सिद्धांतवादी और कर्तव्य से बंधे किरदार के साथ उनके बेटे के ग़ैरकानूनी काम में पकड़े जाने की छोटी सी कहानी दिखाई गयी है, जिसका मुख्य कहानी से कोई संबंध नहीं है।

उनका पूरा ध्यान इस्लामिक मौलवी (जमील ख़ान) पर है, जो 'जन्नत' में टॉफ़ी के पेड़ों का लालच देकर बच्चों को आतंकवादी बनाने का काम कर रहा है। एक और आतंकवादी से उसकी वीडियो कॉल्स बात-चीत के ज़रिये ब्लैंक  ने हमें सिरिया तक फैले उसके नेटवर्क की झलक दी है, इस दूसरे शख़्स की सिर्फ दाढ़ी ही हमें दिखाई देती है।

बॉलीवुड की और फिल्मों की तरह ही ब्लैंक  में भी घनी दाढ़ी, सुरमे वाली आँखों और सिर पर चेकर्ड स्कार्फ़ के साथ मुसलमानों की एक ख़ूंखार छवि दिखाने की कोशिश की गयी है, जो युवाओं में भटकी हुई धार्मिक सोच भरने का काम करते हैं।

सिर्फ सनी देओल की दहाड़ ही दुनिया और क़ुरान-पाक़ को इन 'नापाक़' हाथों से बचा सकती है।

सनी देओल काफी ग़ुस्से में और रिटायरमेंट के लिये तैयार दिखाई देते हैं।

हालांकि 'उसका बाप भी बोलेगा' की उनकी दहाड़ में दम ज़रूर है।

ये दर्शकों की नींद तोड़ने के लिये तो काफ़ी है, लेकिन ब्लैंक  के खोखले ट्विस्ट्स, उबाऊ ऐक्शन और फ़ीके मुठभेड़ों में जान डालने के लिये काफ़ी नहीं है।

कुछ तरकीबें ख़ुद को ज़्यादा गंभीरता से लेने वाली इस मूवी को और भी हास्यास्पद बना देती हैं।

Easemytrip.com ब्लैंक  के प्रोड्यूसर्स में से एक है और कंपनी अपने प्रॉडक्ट्स के प्रचार को लेकर बेहद उत्साहित है, भले ही उनका प्रॉडक्ट आतंकवादी गतिविधियों का ज़रिया क्यों न लगे।

बम तो इतनी आसानी से ऐक्टिवेट और डिफ़्यूज़ हो जाते हैं, जैसे स्विगी पर सैंडविच का ऑर्डर देना या कैंसल करना हो।

कानों में चुभता बैकग्राउंड स्कोर और ब्लैंक  की फोटोग्राफी का फूहड़ फ्रेम रेट दर्शकों की परेशानी और बढ़ा देता है।

इस घटिया फिल्म को बनाने के पीछे का कारण है एक डेब्यू।

करण कपाड़िया डिम्पल कपाड़िया के भांजे और अभिनेत्री से कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर बनी स्वर्गीय सिम्पल कपाड़िया के बेटे हैं।

सिम्पल कपाड़िया ने सनी की कुछ फिल्मों में काम किया है।

यानि कि वो ट्विंकल खन्ना के कज़िन भी हुए, जिनके पति अक्षय ने इस फिल्म में एक डांस अपीयरंस भी दिया है, जो केंड्रिक लमार और एसज़ेडए के ऑल द स्टार्स वीडियो की कॉपी है।

करण के किरदार में दम नहीं है और उनके चेहरे पर कोई हाव-भाव नहीं है। हैरत की बात है।

उनका रोना, चीखना और रक्षा करना, सब कुछ ब्लैंक ही लगता है।

Rediff Rating:

सुकन्या वर्मा